आदिवासी जमीन पर नहीं बनेंगे विधायक-सांसदों के घर, सरकार तलाशेगी वैकल्पिक जमीन
झारखंड विधानसभा के बजट सत्र में विधायकों और सांसदों को जमीन आवंटन का मुद्दा शुक्रवार को भी चर्चा में रहा। सदन में संसदीय कार्य मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने स्पष्ट किया कि आदिवासी परिवारों को दी गई जमीन पर विधायक-सांसदों के घर नहीं बनाए जाएंगे।

झारखंड विधानसभा के बजट सत्र में विधायकों और सांसदों को जमीन आवंटन का मुद्दा शुक्रवार को भी चर्चा में रहा। सदन में संसदीय कार्य मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने स्पष्ट किया कि आदिवासी परिवारों को दी गई जमीन पर विधायक और सांसदों के घर नहीं बनाए जाएंगे। सरकार दो महीने के भीतर विवाद-मुक्त वैकल्पिक जमीन तलाशेगी। मंत्री की बात पर सत्ता पक्ष के विधायकों ने मेज थपथपा कर स्वागत किया।
मंत्री ने सदन को बताया कि विधायकों और सांसदों के आवास निर्माण के लिए झारखंड विधायक एवं सांसद गृह निर्माण स्वावलम्बी सरकारी समिति लिमिटेड की ओर से 28 जून 2016 को राजस्व विभाग से जमीन उपलब्ध कराने का अनुरोध किया गया था। इसके बाद कांके अंचल के मौजा चुटू (थाना संख्या-164) में खाता संख्या-118, प्लॉट संख्या-115 की लगभग 35 एकड़ गैरमजरुआ मालिक परती कदिम भूमि हस्तांतरण के लिए प्रस्तावित की गई। राज्य सरकार ने सात अगस्त 2017 को राज्यादेश संख्या-4107 जारी कर भूमि हस्तांतरण को मंजूरी दी और एक जून 2018 को इसका एकरारनामा भी कर लिया गया।
बिना सहमति बंदोबस्ती रद्द करने का लगाया आरोप
समिति ने 10 अप्रैल 2018 को इस जमीन के लिए एक करोड़ 70 लाख 62 हजार 500 रुपये भी जमा कर दिए थे। मंत्री ने कहा कि पूरी हस्तांतरण प्रक्रिया करीब एक वर्ष 11 महीने तीन दिनों में पूरी कर ली गई थी। हालांकि बाद में पता चला कि वर्ष 1970-71 में इस जमीन की बंदोबस्ती भूमिहीन आदिवासी परिवारों-बंधना करमाली, जुड़वा करमाली, चरकू करमाली, ललकू मुंडा, राजू मिरदहा समेत अन्य के नाम पर की गई थी। उन्होंने आरोप लगाया कि रघुवर दास की नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के दौरान इन आदिवासी परिवारों से बिना सहमति के जमीन की बंदोबस्ती रद्द कर विधायकों और सांसदों के लिए हस्तांतरण की प्रक्रिया जल्दबाजी में पूरी की गई।
ग्रामीणों ने किया विरोध
मंत्री के अनुसार, जब प्रशासनिक अधिकारी जमीन को कब्जा मुक्त कराने पहुंचे तो ग्रामीणों ने इसका विरोध किया और आज भी कई परिवारों का जमीन पर कब्जा बना हुआ है। वर्तमान स्थिति में 35 एकड़ में से लगभग 3.30 एकड़ पर रिंग रोड बन चुका है, दो एकड़ में आदिवासी मसना है, तीन एकड़ में सात डोभा बने हैं, करीब तीन एकड़ परती गढ़ा है और शेष 23.70 एकड़ जमीन पर ग्रामीण खेती कर रहे हैं।
सरकार संवेदनशीलता के साथ फैसला ले रही
मंत्री ने कहा कि ऐसी परिस्थिति में आदिवासियों की जमीन पर कब्जा कर घर बनाना मानवता के खिलाफ होगा। इसलिए हेमंत सोरेन की नेतृत्व वाली सरकार संवेदनशीलता के साथ फैसला ले रही है। मंत्री ने सदन से राय मांगी, जिस पर सदन ने सहमति जताते हुए तय किया कि इस जमीन पर विधायक और सांसदों के आवास नहीं बनेंगे। एक दिन पहले भाजपा विधायक नवीन जायसवाल और सीपी सिंह ने सरकार के आश्वासन के बावजूद तीन दिन में रजिस्ट्री पोर्टल नहीं खुलने का मुद्दा उठाया था।
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