
पेसा नियमावली में सरकार ने ग्राम सभा का छीना अधिकार, अब अफसर की मुहर से चलेगा गांव यह पेसा नहीं, ग्राम स्वराज की हत्या है : कन्हाई सिंह
झारखंड सरकार द्वारा अधिसूचित नई पेसा नियमावली से ग्रामीण क्षेत्रों में आक्रोश बढ़ रहा है। ग्राम सभा की बैठकें अब पंचायत सचिव के हस्ताक्षर और सरकारी मोहर पर निर्भर होंगी, जिससे ग्राम स्वशासन पर हमला माना जा रहा है। भाजपा नेता कन्हाई सिंह ने सरकार से नियमावली में संशोधन की मांग की है।
लातेहार, संवाददाता। झारखंड सरकार द्वारा अधिसूचित नई पेसा नियमावली को लेकर ग्रामीण इलाकों में आक्रोश और निराशा दोनों बढ़ने लगी है। नियमावली के अनुसार अब ग्राम सभा की किसी भी बैठक, निर्णय और प्रस्ताव को तब तक वैध नहीं माना जाएगा, जब तक उस पर पंचायत सचिव के हस्ताक्षर और सरकारी मोहर न हो। यही प्रावधान पूरे विवाद की जड़ बन गया है। भाजपा नेता, जिला सांसद प्रतिनिधि और ग्राम प्रधान कन्हाई सिंह ने इसे ग्राम स्वशासन पर सीधा हमला बताते हुए कहा कि सरकार ने ग्राम सभा को व्यवहारिक रूप से अफसरों के अधीन बंधक बना दिया है। कन्हाई सिंह ने कड़े शब्दों में कहा कि पंचायत सचिव न ग्राम सभा का सदस्य है, ना ही गांव का प्रतिनिधि।
फिर वही अंतिम मुहर लगाए, यह किस तरह का पेसा कानून है? सरकार ने गांव के अधिकार छीनकर फाइलों में कैद कर दिया है। सरकार ने ग्राम सभा को बना दिया है बेवस उन्होंने कहा कि पेसा अधिनियम ग्राम सभा को सर्वोच्च संस्था मानता है, लेकिन नई नियमावली सीधे-सीधे पेसा की आत्मा के खिलाफ है। अब गांव के फैसले गांव में नहीं, बल्कि दफ्तरों और अफसरों के हस्ताक्षर पर निर्भर रह जाएंगे। कन्हाई सिंह ने मांग की कि सरकार तुरंत नियमावली में संशोधन करे और ग्राम सभा को उसका वास्तविक अधिकार लौटाए। उनके अनुसार यदि सरकार नहीं चेती, तो ग्राम सभा सिर्फ नाम की रह जाएगी और वास्तविक निर्णय अफसरशाही करेगी। ग्राम क्षेत्रों में इस मुद्दे पर चर्चा तेज़ हो गई है। लोग सवाल पूछ रहे हैं, क्या यह नियमावली विकास लेकर आएगी, या फिर ग्राम पंचायतों को सिर्फ कागज़ी संस्था बनाकर छोड़ देगी।

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