कोडरमा की पहचान केसरिया कलाकंद को जीआई टैग दिलाने के लिए कसी कमर

Newswrap हिन्दुस्तान, कोडरमा
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कोडरमा के व्यापारियों और नेताओं ने केसरिया कलाकंद को जीआई टैग दिलाने के लिए प्रयास तेज कर दिए हैं। अगर यह सफल होता है, तो यह झारखंड की पहली मिठाई होगी जिसे जीआई टैग मिलेगा। वर्तमान में झारखंड की किसी मिठाई को जीआई टैग प्राप्त नहीं हुआ है। यह स्थानीय उत्पादों की पहचान और मांग बढ़ाने में मदद करेगा।

कोडरमा की पहचान केसरिया कलाकंद को जीआई टैग दिलाने के लिए कसी कमर

कोडरमाकोडरमा। कोडरमा की पहचान केसरिया कलाकंद को जीआई टैग दिलाने के लिए यहां के व्यापारियों और नेताओं ने कमर कस ली है। अगर सबकुछ सही रहा तो झुमरी तिलैया का केसरिया कलाकंद झारखंड की पहली मिठाई होगी, जिसे जीआई टैग मिल सकता है। कलाकंद को जीआई टैग देने का मामला वर्षों से लंबित है। लेकिन, अब फैसले की घड़ी नजदीक है। कोडरमा जिले के व्यापारियों और नेताओं ने जीआई टैग के लिए दबाव बढ़ाया है। झारखंड मुक्ति मोर्चा के जिलाध्यक्ष बीरेंद्र पांडेय का कहना है कि वे जल्द ही राज्य के मुखिया हेमंत सोरेन को पत्र लिखकर इस मामले में पहल करने की अनुरोध करेंगे।

मालूम हो कि झारखंड की किसी मिठाई को अभी तक जीआई टैग नहीं मिला है। झारखंड में देवघर का पेड़ा बहुत प्रसिद्ध है, जो बाबा बैद्यनाथधाम में भोग लगाने के लिए जाना जाता है। कई वर्षों से (2021-22 से) इसके लिए जीआई टैग की कोशिशें चल रही हैं, लेकिन अभी तक यह मिला नहीं है।इसी तरह, कोडरमा का केसरिया कलाकंद भी जीआई टैग के लिए प्रक्रिया में है और आने वाला बताया जा रहा है, लेकिन 2025-26 तक की उपलब्ध जानकारी के अनुसार अभी अप्रूव नहीं हुआ है।झारखंड को कुल मिलाकर बहुत कम जीआई टैग मिले हैं। राज्य का एकमात्र प्रमुख जीआई-टैग्ड उत्पाद सोहराई पेंटिंग है, जो एक हस्तशिल्प है, मिठाई नहीं। मिठाइयों या खाद्य उत्पादों में कोई भी झारखंडी मिठाई (जैसे पेड़ा, कलाकंद आदि) अभी जीआई टैग प्राप्त नहीं कर पाई है। हाल ही में (2025-26) नाबार्ड और राज्य सरकार देवघर का अट्ठे मटन, मीठा इमली, कुचाई हल्दी आदि जैसे 28 उत्पादों के लिए जीआई टैग की प्रक्रिया चला रही है, लेकिन इनमें कोई मिठाई शामिल नहीं है। अगर भविष्य में देवघर का पेड़ा या कोडरमा कलाकंद को जीआई टैग मिल जाता है, तो यह झारखंड की पहली मिठाई बनेगी।फिलहाल इन उत्पादों को मिला है जीआई टैगझारखंड के एक भी खाद्य पदार्थ को जीआई टैग नहीं मिला है। ऐसे में यहां के लोगों की यह मांग उठने लगी है कि अगर बर्धमान के मिहिदाना, कोलकाता का रसोगुल्ला, धारवाड़ (कर्नाटक) के पेड़ा, तिरुपति के लड्डू को जीआई टैग मिल सकता है, तो झुमरी तिलैया के कलाकंद को क्यों नहीं? मालूम हो कि टैग भारत सरकार के वाणिज्य मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले कंट्रोलर जनरल आफ पेटेंट्स, डिजाइन एंड ट्रेडमार्क्स के द्वारा दिया जाता है।जीआई टैग मिलने के फायदेकोडरमा के केसरिया कलाकंद को अगर जीआई टैग मिलता है तो इसके कई फायदे तत्काल देखने को मिल जाएंगे। सबसे पहले कि जीआई टैग मिलने से केसरिया कलाकंद को वैश्विक पहचान मिलेगी। साथ ही इसकी गुणवत्ता में इजाफा होगा। पहचान बढ़ेगी तो मांग भी बढ़ेगी। अगर मांग बढ़ेगी तो इसकी पूर्ति के लिए उत्पादन भी बढ़ाया जाएगा। जब उत्पादन बढ़ाने की बारी आएगी तो स्वत: ही इसमें रोजगार भी बढ़ेंगे। लोगों की आय में इजाफा होगा।कोडरमा में ऐसे हुई थी कलाकंद की शुरुआतझुमरीतिलैया स्थित कन्हैया कॉन्फेक्शनर के संचालक विकास सेठ और आनंद विहार के संचालक अमित कुमार बताते हैं कि झुमरीतिलैया में वर्ष 1960-62 में पंजाब से आकर बसे दो भाई हंसराज भाटिया और मूलकराज भाटिया ने कलाकंद बनाना शुरू किया।क्या है जीआई टैगजीआई (ज्योग्राफिकल इंडीकेशन) टैग किसी उत्पादन को उसके भौगोलिक क्षेत्र से संबंधित पहचान के लिए दिया जाता है। इसके तहत उत्पाद की गुणवत्ता, उसकी महत्ता, फायदे और अन्य पहलुओं को उजागर करता है। सबसे बड़ी बात किसी उत्पादन का अगर जीआई टैग हासिल हो जाता है तो उसकी नकल मुश्किल हो जाती है।क्या कहते हैं लोगनोट तीन लोगों का वर्जन हैकेसरिया कलाकंद कोडरमा हीं नहीं, पूरे भारत के साथ-साथ विदेशों में भी प्रसिद्ध है। इसे जीआई टैग मिलना ही चाहिए। हम इसके लिए राज्य के मुखिया हेमंत सोरेन को पत्र लिखकर मांग करेंगे कि वे इसके लिए पहल करें। इससे कोडरमा की एक अलग पहचान मिलेगी।बीरेंद्र पांडेय, जिलाध्यक्ष, कोडरमा, झारखंड मुक्ति मोर्चादो का वर्जन जल्द

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