
'बेवजह जनता का पैसा ना बर्बाद करें', झारखंड सरकार पर हाई कोर्ट ने लगाया हर्जाना; क्या थी वजह
बेवजह की बार-बार मुकदमेबाजी को लेकर झारखंड हाई कोर्ट ने हेमंत सोरेन सरकार पर हर्जाना लगाया है। इसके साथ ही नसीहत दी है कि जनता के पैसे को बेवजह की मुकदमेबाजी में बर्बाद किया जाए।
झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की बेवजह और बार-बार की जाने वाली मुकदमेबाजी पर कड़ी नाराजगी जताई है। बुधवार को चीफ जस्टिस तरलोक सिंह चौहान और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने कहा कि राज्य सरकार अपने ही कर्मचारियों को न्याय से वंचित रखने के लिए बार-बार अदालतों का दरवाजा खटखटा रही है, जिससे न केवल न्याय प्रक्रिया प्रभावित होती है, बल्कि जनता का धन भी व्यर्थ जाता है।

अदालत ने कहा कि राज्य वेलफेयर स्टेट है, न कि ऐसा पक्षकार जो अपने नागरिकों के खिलाफ किसी भी तरह मुकदमा जीतना चाहता हो। इसके साथ ही अदालत ने सरकार की अपील याचिका खारिज कर दी और सरकार पर 50 हजार का हर्जाना भी लगाया।
जानिए क्या है पूरा मामला
मामला अखिलेश प्रसाद नामक अधिकारी से जुड़ा था, जो पहले बिहार सरकार में सहकारिता विस्तार पदाधिकारी थे और झारखंड गठन के बाद यहां के प्रशासनिक सेवा में शामिल हुए। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी सरकार ने उनकी पदस्थापना 2013 से प्रभावी करने में देरी की। इस पर अखिलेश ने कोर्ट की शरण ली। हाईकोर्ट की एकल पीठ ने उनके उनके पक्ष में फैसला सुनाया, लेकिन राज्य सरकार ने इस आदेश के खिलाफ फिर अपील दायर कर दी, जिसे अदालत ने बेमानी और बेवजह मुकदमेबाजी करार देते हुए खारिज कर दिया।
चीफ जस्टिस ने अपने आदेश में लिखा है कि राज्य के अधिकारी यह भूल जाते हैं कि मुकदमेबाजी का खर्च सरकारी खजाने से आता है, उनकी जेब से नहीं। इसलिए वे बिना जरूरत के मुकदमे दायर करते हैं। अदालत ने इस मामले में राज्य सरकार पर 50 हजार रुपये का हर्जाना लगाया और कहा कि यह राशि पहले राज्य सरकार कर्मचारी को दे, फिर छह महीने के भीतर संबंधित अधिकारी से वसूली करे। प्रतिवादी अखिलेश प्रसाद की ओर से अधिवक्ता सिद्धार्थ रंजन ने पक्ष रखा। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि झारखंड सरकार 2011 में जारी अपनी मुकदमेबाजी नीति (लिटिगेशन पॉलिशी) को सख्ती से लागू करे और ऐसे मामलों की नियमित समीक्षा करे।



