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विद्यासागर के कर्मभूमि को जीवंत कर रही रेलवे की पेंटिंग

अब करमाटांड़ स्टेशन की दीवारें विख्यात समाज सुधारक पंडित ईश्वरचंद्र विद्यासागर के जीवन दर्शन से रू-ब-रू करा रही हैं। विद्यासागर स्टेशन पर अपनी बेजोड़ एवं अनूठी कला से चमकते-दमकते पेंटिंग को बहुत ही जीवंतता के साथ उजागर किया गया। समाज सुधारक पंडित ईश्वरचंद्र विद्यासागर के समृद्ध इतिहास व समाजिक सुधार का अनूठा संगम है। गौरतलब है कि करमाटांड़ पंडित ईश्वरचन्द्र विद्यासागर की कर्मभूमि रही हैं। इनके नाम से स्टेशन का नामकरण भी किया गया है। आसनसोल रेलमंडल की इस पहल की चहुंओर सराहना की जा रही है। स्टेशन की दीवारों पर पंडित ईश्वरचंद्र के जीवन दर्शन और उनके द्वारा किए गए समाजिक सुधार की चित्रकारी मनोहारी लग रहा है। जहां पूर्व में स्टेशन की दीवारें पान की पीक से रंगीन रहा करता था। वही अब दीवारों में सुनहले रंगों से उकेरा गया चित्र लोगों को बरबस ही अपनी ओर खींच रहा है। स्टेशन की दीवारों पर 29 दिसंबर 1841 को कोर्ट विलियम कॉलेज से प्रधान पंडित का पद ग्रहण करते किया गया है। विद्यासागर कॉलेज के 125 वर्ष पूरे होने पर भारत सरकार द्वारा जारी डाक टिकट, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर का विवाह 14 वर्ष की आयु में दीनामणि देवी के साथ हुआ। सन् 1876 में ईश्वर चन्द्र विद्यासागर के घर का नाम बेदुर बागान था। जहां पर रामकृष्ण परमहंस इनसे मिलने आए थे। ईश्वरचंद्र विद्यासागर का करमाटांड स्थित घर जहां उन्होंने अपने जीवन का अंतिम समय व्यतीत किया। करमाटांड़ का पूर्ववर्ती नाम नंदनकानन में ईश्वरचन्द्र विद्यासागर द्वारा गरीब आदिवासी समुदाय को वस्त्र दान किए। ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने सन 1855 ई में बांग्ला वर्णमाला की रचना की। करमाटांड़ का पूर्ववर्ती नाम नंदनकानन में गरीब आदिवासी समुदाय को भोजन कराते हुए ईश्वरचंद्र विद्यासागर बांग्ला पढ़ाने के लिए रात्रि पाठशालाओं की व्यवस्था किए तथा स्वयं अध्यापन का भी कार्य किए। इसके अलावे 1856 ई में प्रथम पुनर्विवाह कराते समेत अन्य पेंटिंग को जीवंत रूप देने की कोशिश की गई है।

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  • Web Title:Paintings of railway making the education field alive