टेट की अनिवार्यता के ख़िलाफ़ शिक्षकों ने मुखर किए विरोध के स्वर
सुप्रीम कोर्ट के 2011 से पहले नियुक्त शिक्षकों के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (टेट) अनिवार्य करने के फैसले ने देशभर में विरोध को जन्म दिया है। लाखों शिक्षक दिल्ली के रामलीला मैदान में एकजुट हुए हैं। झारखंड में 25,000 शिक्षक इस फैसले से प्रभावित हैं, जो पिछले 15-20 वर्षों से सेवा में हैं।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2011 से पहले नियुक्त शिक्षकों के लिए भी शिक्षक पात्रता परीक्षा (टेट) अनिवार्य किए जाने के फैसले ने देशव्यापी विरोध की लहर पैदा कर दी है। इस आदेश के विरोध में शनिवार को दिल्ली के रामलीला मैदान में देशभर के लाखों शिक्षक 'टीचर्स फेडरेशन ऑफ इंडिया' के बैनर तले एकजुट हुए हैं। केंद्र और राज्य सरकारों पर दबाव बनाने के उद्देश्य से आयोजित इस प्रदर्शन का सीधा असर झारखंड और विशेष रूप से जमशेदपुर (पूर्वी सिंहभूम) के शैक्षणिक ढांचे पर पड़ता दिख रहा है। झारखंड में इस फैसले का प्रभाव काफी व्यापक है। शिक्षक संघों के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि राज्य में लगभग 25,000 ऐसे शिक्षक हैं जिनकी सेवा शर्तों पर इस आदेश के बाद तलवार लटक गई है।
झारखंड में 2011 से पहले बड़ी संख्या में प्राथमिक और मध्य विद्यालयों में नियुक्तियां हुई थीं, जिन्हें उस समय की प्रचलित नियमावली के अनुसार वैध माना गया था। अब सुप्रीम कोर्ट के इस नए निर्देश ने उन अनुभवी शिक्षकों के सामने भी योग्यता साबित करने की चुनौती खड़ी कर दी है जो पिछले 15-20 वर्षों से सेवा दे रहे हैं।जमशेदपुर और कोल्हान प्रमंडल के जिलों की बात करें, तो यहाँ के हजारों शिक्षक दिल्ली के आंदोलन में शामिल होने पहुंचे हैं। स्थानीय शिक्षक संघों के अनुसार, कोल्हान प्रमंडल में करीब 4,000 से अधिक शिक्षक इस श्रेणी में आते हैं जिन्होंने 2011 से पहले अपनी सेवा शुरू की थी। इन शिक्षकों का तर्क है कि जब उनकी नियुक्ति हुई थी, तब टेट जैसी कोई अनिवार्य शर्त नहीं थी और उन्होंने विभाग द्वारा निर्धारित सभी तत्कालीन मापदंडों और परीक्षाओं को उत्तीर्ण किया था। अचानक से एक दशक से ज्यादा की सेवा के बाद नई परीक्षा थोपना न केवल उनके करियर के साथ खिलवाड़ है, बल्कि उनके परिवारों के भविष्य को भी संकट में डालना है।झारखंड के संदर्भ में स्थिति इसलिए भी जटिल है क्योंकि राज्य में शिक्षक पात्रता परीक्षा (जेटेट) का आयोजन नियमित रूप से नहीं हुआ है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, हाल ही में झारखंड एकेडमिक काउंसिल (जैक ) ने अप्रैल 2026 से नई जेटेट परीक्षा के लिए आवेदन प्रक्रिया शुरू करने की घोषणा की है, लेकिन पुराने शिक्षकों के लिए इस उम्र में नए सिरे से प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करना मानसिक और पेशेवर रूप से चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने इन शिक्षकों को परीक्षा पास करने के लिए दो साल का समय दिया है, लेकिन विफल होने की स्थिति में 'सेवा समाप्ति' के डर ने शिक्षकों को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया है।जमशेदपुर के विभिन्न स्कूलों में कार्यरत वरिष्ठ शिक्षकों का कहना है कि वे वर्षों से शिक्षण कार्य कर रहे हैं और उनके द्वारा पढ़ाए गए छात्र आज विभिन्न प्रतिष्ठित पदों पर हैं। ऐसे में उनकी शैक्षणिक योग्यता पर इस तरह का प्रश्नचिह्न लगाना तर्कसंगत नहीं है। फिलहाल, दिल्ली में हो रहे इस प्रदर्शन के माध्यम से शिक्षक यह मांग कर रहे हैं कि 2011 से पहले नियुक्त शिक्षकों को इस अनिवार्यता से 'छूट' (एक्ज़ेम्पशन) दी जाए या फिर उनकी सेवा अवधि और अनुभव को ही योग्यता का पैमाना माना जाए।
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