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सर्वे भवन्तु सुखिन सर्वे संतु निरामया ही है मानवाधिकार की मूल प्रेरणा : डॉ एके झा

सर्वे भवन्तु सुखिन सर्वे संतु निरामया ही है मानवाधिकार की मूल प्रेरणा : डॉ एके झा

संक्षेप:

एलबीएसएम कॉलेज जमशेदपुर के राजनीति विज्ञान विभाग ने मानवाधिकार सिद्धांत और व्यवहार पर एक दिवसीय सेमिनार आयोजित किया। मुख्य वक्ता डॉ ए के झा ने मानवाधिकारों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उनके महत्व पर चर्चा की। वक्ताओं ने मानवाधिकारों के विकास, उनकी रक्षा और समकालीन संदर्भ में उनके कार्यान्वयन की आवश्यकता पर जोर दिया।

Dec 10, 2025 04:10 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, जमशेदपुर
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मानवाधिकार सिद्धांत एवं व्यवहार विषय पर एलबीएसएम कॉलेज जमशेदपुर के राजनीति विज्ञान विभाग द्वारा आयोजित एक दिवसीय सेमिनार में मुख्य वक्ता महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ अशोक कुमार झा, वक्ता के रूप में डॉ अजेय वर्मा, डॉ कमलेश कुमार कमलेंदु, डॉ मौसमी पॉल ने अपने वक्तव्य रखे।वेदों में जन विश से होकर गुजरते हुए भारतीय आदिवासी स्वशासन व्यवस्था जो व्यक्ति मात्र के सम्मान के प्रति सामूहिक चेतना के साथ उत्प्रेरित है। वास्तव में मानवाधिकार की मूल अवधारणा को आकर प्रदान करता है।"सं गच्छध्वम् सं वदध्वम्" "वसुधैव कुटुंकम" के साथ "परोपकार: पुन्याय पापाय परपीड़नम" की अवधारणा ही सम्यक मानवाधिकार का आधार हो सकता है।

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ये बातें राजनीति विज्ञान विभाग में आयोजित सेमिनार में मुख्य वक्ता डॉ ए के झा ने कही।अतिथियों का स्वागत एवं विषय प्रवेश करते हुए राजनीति विज्ञान विभाग के अध्यक्ष डॉ विनय कुमार गुप्ता ने कहा कि आज जिस विषय पर हम विचार-विमर्श के लिए एकत्र हुए हैं-मानवाधिकार: सिद्धांत एवं व्यवहार” वह विषय केवल कानून, राजनीति विज्ञान या समाजशास्त्र का विषय नहीं है, बल्कि यह समस्त मानव सभ्यता के नैतिक और बौद्धिक विकास का केंद्रबिंदु है। मानवाधिकार किसी राष्ट्र की देन नहीं हैं, बल्कि वे मनुष्य के जन्मसिद्ध अधिकार हैं, जो उसकी गरिमा, स्वतंत्रता, समानता और सम्मान की रक्षा करते हैं।मानवाधिकारों की अवधारणा इस विचार पर आधारित है कि हर मनुष्य, सिर्फ मनुष्य होने के कारण, कुछ मूलभूत अधिकारों का अधिकारी है। ये अधिकार जाति, धर्म, रंग, भाषा, लिंग, आर्थिक स्थिति या सामाजिक पृष्ठभूमि से परे हैं। मानवाधिकारों का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी व्यक्ति अमानवीय व्यवहार, अन्याय, शोषण या भय के वातावरण में जीवन व्यतीत न करे।ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो मानवाधिकारों का विचार अचानक उत्पन्न नहीं हुआ, बल्कि यह मानव समाज के लंबे संघर्षों, आंदोलनों और अनुभवों का परिणाम है। प्राचीन भारतीय दर्शन में “सर्वे भवन्तु सुखिनः” जैसी अवधारणाएँ, बुद्ध की करुणा, महावीर का अहिंसा सिद्धांत, यूनानी दार्शनिकों की प्राकृतिक न्याय की अवधारणा, मैग्नाकार्टा, फ्रांसीसी क्रांति और अंततः 1948 की संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा — ये सभी मानवाधिकारों के विकास की महत्वपूर्ण कड़ियाँ हैं।आज के वैश्विक परिदृश्य में मानवाधिकार केवल नैतिक उपदेश नहीं रह गए हैं, बल्कि वे संवैधानिक, कानूनी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सिद्धांत बन चुके हैं।प्रत्येक लोकतांत्रिक देश का यह दायित्व है कि वह अपने नागरिकों की गरिमा की रक्षा करे और उनके अधिकारों को वास्तविक रूप से लागू करे। भारत जैसे देश में, जहाँ सामाजिक विविधता, आर्थिक असमानता और सांस्कृतिक बहुलता है, वहाँ मानवाधिकारों का महत्व और भी बढ़ जाता है। भारत का संविधान मानवाधिकारों का एक सशक्त दस्तावेज है, जो समानता, स्वतंत्रता,धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय की भावना पर आधारित है।वक्ता के रूप में शामिल डा अजेय वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय द्वारा दिए गए इस संबंध में दिए गए निर्णयों का उल्लेख किया तथा मानवाधिकारों के आयामों में किस प्रकार से विस्तार हुआ उसका वृहत रूप से उल्लेख किया।वक्ता डॉ कमलेश कुमार कमलेंदु ने कहा कि मानवाधिकार हमें मानव होने के नाते मिला है। अन्य को नहीं मिला है। मानवाधिकार आयोग उसकी रक्षा करता है।समापन एवं ध्यानवाद ज्ञापन करते हुए आईक्यूएसी समन्वयक डॉ मौसमी पॉल ने कहा कि समकालीन परिदृष्य में मानवाधिकार के साथ साथ मानव अधिकार कर्तव्य के विषय में सचेतन होने की जरूरत है।कार्यक्रम संचालन राजनीति विज्ञान विभाग के प्रो विकास मुंडा ने किया।राष्ट्रगान के साथ सेमिनार का समापन हुआ।इस अवसर पर मुख्य रूप से डॉ दीपांजय श्रीवास्तव,प्रो पुरुषोत्तम प्रसाद, प्रो संतोष राम, डॉ सुष्मिता धारा, डॉ सुधीर कुमार सहित सैकड़ों विद्यार्थी उपस्थित रहे।