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‘खत्म कुरान से तरावीह से आजादी नहीं, ईद का चांद नजर आने तक पढ़ें

माहे रमजान की इबादतों में अहम ‘तरावीह में कम समय में ‘खत्म कुरान का रिवाज चल पड़ा है। व्यवसायी और कामकाजी वर्ग ने आठ, दस और 15 दिनों की ‘तरावीह अदा कर रहे हैं।

जाकिरनगर में खानकाह शरफ में छह दिनों में खत्म कुरान हुआ। इस्लामी विद्वान मानते हैं कि तरावीह उस वक्त तक पढ़नी है,जब तक ईद का चांद नजर न आए।

‘तरावीह पढ़ना सुन्नत है : मस्जिदे रहमान साकची गौशाला के इमाम मुफ्ती निशात अहमद बताते हैं कि ‘तरावीह की नमाज 20 रिकत चांद देखकर शुरू करना और चांद देखकर खत्म करना सुन्नत है। व्यवसायी, पेशा और सफर के मद्देनजर सुविधा के अनुसार ‘खत्म कुरान खत्म कर लें। मगर इसके बाद वह तरावीह से आजाद नहीं होते हैं। ईद का चांद नजर आने तक हर हाल में 20 रिकत पढ़ना है।

तीन दिन से कम में नहीं : मदीना मस्जिद आजादनगर के इमाम मुफ्ती अब्दुल मालिक मिस्बाही बताते हैं कि शरीयत के मुताबिक तीन दिन से कम में ‘खत्म कुरान करना मकरूह है। उससे अधिक दिनों में जायज है। तरावीह उस वक्त तक पढ़नी है, जब तक ईद का चांद नजर नहीं आए। हजरत उमर फारुख के जमाने से आज तक मस्जिदे नबवी और तमाम मस्जिदों में तरावीह का सिलसिला जारी है।

लोग सोते ही नहीं जगाएं किसे : आजादी से पहले रमजान में रोजेदारों को सेहरी में जगाने के लिए फकीर आते थे। फिर चौकीदारों का सिलसिला चल पड़ा। 1970 के दशक में कव्वाली की शक्ल में सेहरी जगाने का परंपरा जोर पकड़ी। कव्वाली का मुकाबला होता था और इनाम भी रखा जाता था। इस प्रचलन ने शहर को कई शायर और कव्वाल दिए। 1979 दंगा के बाद यह सिलसिला थमने के साथ अतीत की बात हो गयी है। शहर के मशहूर कव्वाल इमाम जॉनी ‘नाबीना कहते हैं कि लोग सोते ही नहीं, जगाएं किसे।

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  • Web Title:Do not have freedom from 'overarching Koran', read until the moon is visible