हमारी लड़ाई राजनीतिक नहीं, अस्तित्व की है : चंपाई सोरेन
घाटशिला विधानसभा उपचुनाव के परिणाम पर पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन ने कहा कि उनकी लड़ाई राजनीतिक नहीं है, बल्कि आदिवासी संस्कृति, भाषा और अस्तित्व की रक्षा की है। उन्होंने चुनाव में अपनी बात मजबूती से न रख पाने की बात स्वीकार की और कहा कि संघर्ष लंबा है, लेकिन वे पीछे नहीं हटेंगे।

घाटशिला विधानसभा उपचुनाव का परिणाम घोषित होने के बाद शुक्रवार को भाजपा प्रत्याशी बाबूलाल सोरेन के पिता और झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन ने प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने कहा कि उनकी लड़ाई राजनीतिक नहीं, बल्कि बदलती जनसांख्यिकी, अवैध घुसपैठ, धर्मांतरण और आदिवासी समाज की भाषा, संस्कृति, परंपरा व अस्तित्व की रक्षा की लड़ाई है। चंपाई सोरेन ने स्वीकार किया कि उपचुनाव में शायद वे अपनी बात जनता के बीच उतनी मजबूती से नहीं रख पाए। उन्होंने घाटशिला क्षेत्र के समर्थकों का धन्यवाद करते हुए कहा कि यह संघर्ष लंबा और चुनौतीपूर्ण है, लेकिन वे पीछे हटने वाले नहीं हैं। उन्होंने कहा कि चुनाव आते-जाते रहेंगे, जीत-हार होती रहेगी, लेकिन हमारा समाज बचना चाहिए।
आदिवासियत बची रहेगी, तभी झारखंड बचेगा। पूर्व मुख्यमंत्री ने पाकुड़, साहिबगंज समेत कई जिलों में घुसपैठ पर गंभीर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि भूमि पुत्रों की जमीन, संस्कृति और बेटियों की अस्मिता की रक्षा नहीं हो पाई तो वही असली हार होगी। चंपाई सोरेन ने स्पष्ट कहा कि झारखंड के आदिवासी और मूलवासी समाज की जमीन, धर्म और संस्कृति की सुरक्षा के लिए उनका संघर्ष हमेशा जारी रहेगा। जब-जब अधिकारों पर चोट होगी, वे हर बार विरोध के लिए खड़े रहेंगे।

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