
बीएलओ के सामने बांग्ला, उड़िया पढ़ने की बड़ी चुनौती
बूथ लेवल अफसरों (बीएलओ) को बांग्ला और उड़िया भाषा की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। जब वे पश्चिम बंगाल या ओडिशा के मतदाताओं की वोटर लिस्ट की जांच करते हैं, तो उन्हें स्थानीय भाषा में जानकारी मिलती है। यह समस्या बीएलओ के लिए पढ़ना कठिन बना रही है, खासकर जब भीड़ होती है।
बूथ लेवल अफसरों (बीएलओ) के समक्ष एक नहीं, अनेक चुनौतियां हैं। इनमें एक और चुनौती जुड़ गई है, बांग्ला और उड़िया भाषा जानने की। हिन्दी भाषी बीएलओ जब किसी पश्चिम बंगाल या ओडिशा के मूल निवासी की वोटर लिस्ट की पैतृक मैपिंग के लिए संबंधित एप को खोलती हैं तो उन्हें वहां की वोटर लिस्ट स्थानीय भाषा में दिखती है। जबकि हिन्दी भाषी बीएलओ के लिए बांग्ला या उड़िया समझना टेढ़ी खीर है। ये दोनों भाषा बोलने वाले तो जमशेदपुर में बहुत हैं, परंतु बीएलओ के लिए पढ़ना मुश्किल ही नहीं, असंभव सा है। शनिवार से शुरू शिविर में यह परेशानी सामने आई है।
बहुत से मतदाताओं का अपना नाम या उनके माता-पिता का नाम पश्चिम बंगाल या ओडिशा में होने पर वहां के वोटर लिस्ट को खोलना पड़ता है, क्योंकि 2003 की वोटर लिस्ट से उसका मिलान करना है। परंतु जब वोटर लिस्ट खुलता है तो उसमें लिखी भाषा बीएलओ की समझ में ही नहीं आती। ऐसे में वे विवश हो जाती हैं। जमशेदपुर पूर्वी विधानसभा क्षेत्र में इसकी जानकारी मिलने के बाद एक सहायक निर्वाचक निबंधन पदाधिकारी स्वयं बूथ पर पहुंचे। वहां पहुंचकर मोबाइल खोलकर बीएलओ को बताया कि ऐसी स्थिति आने पर वे विवरण को कॉपी कर गूगल ट्रांसलेशन में जाएं और उसे पेस्ट कर संबंधित भाषा का कॉलम चुनकर बांग्ला से हिन्दी या उड़िया से हिन्दी करें तो उन्हें हिन्दी में नाम व अन्य विवरण दिख जाएगा। समस्या यह है कि अब अधिकांश बीएलओ आंगनबाड़ी सेविका हैं। अगर उनके सामने यह समस्या आ रही है तो वे परेशान हो जा रही हैं। ऐसे में जब बूथ पर भीड़ हो तो उनकी परेशानी और बढ़ जा रही है। वैसे निर्वाचन विभाग भी मानता है कि यह काम चुनौतीपूर्ण है, परंतु उसका लक्ष्य एसआईआर शुरू होने से पहले अधिकांश वोटर की मैपिंग कार्य पूरा कराना है, ताकि जब एसआईआर शुरू हो उस समय अधिक मगजमारी न करनी पड़े।

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