भोपाल गैस कांड में खोई रोशनी 23 साल बाद लौटी, देख रहे दुनिया

हिन्दुस्तान, जमशेदपुर
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भोपाल गैस त्रासदी के दौरान 1984 में मधुसूदन की आंखों की रोशनी चली गई थी। 23 साल बाद, उन्हें कॉर्निया मिल गया और उनकी रोशनी लौट आई। इसी प्रकार अमर कुमार और एक 70 वर्षीय किसान की आंखों की रोशनी भी लौट आई है। 1994 से जमशेदपुर आई हॉस्पिटल में कॉर्निया ट्रांसप्लांट हो रहा है।

भोपाल गैस कांड में खोई रोशनी 23 साल बाद लौटी, देख रहे दुनिया

भोपाल गैस त्रासदी के दौरान 1984 में गैस के कारण चांडिल निवासी 15 वर्षीय मधुसूदन के आंखों की रोशनी चली गई थी। उस समय वे भोपाल में भवन निर्माण में तकनीशियन का काम करते थे। आंखों की रोशनी जाने से उन्हें काम छोड़कर जमशेदपुर आना पड़ा। 23 साल बाद उनकी रोशनी लौट आई है। 2007 में रोशनी संस्था के परविंदर सिंह का उन्हें फोन आया कि उनके लिए कॉर्निया मिल गया है और वह आकर लगवा लें। उनके खुशी का ठिकाना न रहा। वे जमशेदपुर आई हॉस्पिटल पहुंचे और बिना किसी खर्च के कॉर्निया लगवा लिया। इसके बाद रोशनी लौट आई। वे आज 55 वर्ष के हैं और फिर से भोपाल में काम कर रहे हैं। उनके अलावा अमर कुमार की भी पांच वर्ष की उम्र में तबीयत बिगड़ने के बाद एक आंख की रोशनी चली गई थी। करीब 20 साल बाद 2012 में उनका भी कॉर्निया बदला गया, जिससे आंख की रोशनी लौट आई। रोशनी आने के बाद उन्होंने इंटरमीडिएट, ग्रेजुएशन किया। अब टेक्नीशियन का कोर्स कर संस्था के अस्पताल में लैब इंचार्ज के रूप में काम कर रहे हैं। चांडिल के अंबुज नगर के 70 वर्षीय किसान की आंख की भी रोशनी चली गई थी। उनकी रोशनी भी लौट आई है.

1994 से ही हो रहा कॉर्निया ट्रांसप्लांट

वर्ष 1994 से जमशेदपुर आई हॉस्पिटल में मृत व्यक्ति का कॉर्निया निकालना और लगाना दोनों काम होने लगा, जो 2013 तक चला। रोशनी संस्था की प्रमुख तरु गांधी ने बताया कि डॉ. जीबी सिंह और डॉ. बीपी सिंह ने यह काम शुरू किया था और लंबे समय तक यह चलता रहा। बाद में जमशेदपुर आई हॉस्पिटल में भी यह बंद हो गया। अब जमशेदपुर में कहीं भी आई बैंक नहीं होने से नेत्र को रखा नहीं जा सकता है, इसलिए उसे यहां से रांची और कोलकाता के अलग-अलग आई बैंक में भेजा जाता है। उन्होंने बताया कि यहां नेत्र दान करने वालों में 80 फीसदी लोग गुजराती जैन समाज के लोग शामिल हैं.

प्रत्येक साल 10 लोगों का जीवन हो रहा रोशन

1994 से अबतक तक जमशेदपुर के 162 लोगों की मृत्यु के बाद परिजनों ने नेत्रदान किया था। प्रत्येक व्यक्ति की दोनों आंख दो अलग-अलग लोगों को लगाई जाती है, जिससे उनकी आंखो की रोशनी लौट गई। देखा जाए तो प्रत्येक वर्ष औसतन करीब 10 लोगों के आंखों की रोशनी लौटती है। इन 32 वर्ष में 334 लोगों के आंखों की रोशनी लौटी।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भोपाल गैस त्रासदी के दौरान मधुसूदन की उम्र कितनी थी?
15 वर्षीय
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