प्रकृति पर्व बाहा: पारंपरिक उल्लास के साथ मनाया गया 'बाहा सेंदरा'
आदिवासी संस्कृति के पर्व बाहा पर 'बाहा सेंदरा' का आयोजन किया गया। विभिन्न क्षेत्रों में ग्रामीणों ने परंपराओं को जीवंत रखा। इस पर्व का उद्देश्य प्रकृति के प्रति आभार प्रकट करना और सामूहिकता का प्रतीक बनाना है। सामूहिक भोज और पारंपरिक नृत्य से भाईचारे का संदेश फैलाया गया।
आदिवासी संस्कृति के पावन पर्व बाहा के शुभ अवसर पर विभिन्न आदिवासी बहुल इलाकों में पारंपरिक 'बाहा सेंदरा' का भव्य आयोजन किया गया। परसूडीह, सरजमदा, छोलागोड़ा, शंकरपुर, पोंडेहासा, सुंदरनगर और बुलनगोड़ा जैसे क्षेत्रों में उत्सव का खास उत्साह देखने को मिला, जहाँ ग्रामीणों ने अपनी सदियों पुरानी परंपराओं को जीवंत रखा। परंपरा और सेंदरा का आयोजन बाहा पर्व प्रकृति के प्रति आभार प्रकट करने का त्योहार है। इस अवसर पर 'बाहा सेंदरा' की परंपरा निभाई गई, जिसमें ग्रामीणों ने संगठित होकर हिस्सा लिया। परंपरा के अनुसार, गांव-गांव में युवाओं और पुरुषों की टोलियों ने मुर्गियों का शिकार किया। यह प्रक्रिया केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि आदिम संस्कृति और सामूहिक एकजुटता का प्रतीक मानी जाती है।
सामूहिक भोज और सांस्कृतिक मिलन शिकार के पश्चात, शाम को गांव के अखड़ा और सार्वजनिक स्थानों पर सामूहिक भोज का आयोजन किया गया। पूरे गांव ने एक साथ मिल-बैठकर प्रसाद ग्रहण किया, जिससे आपसी भाईचारे का संदेश प्रसारित हुआ। ढोल, नगाड़े और मांदर की थाप पर पारंपरिक नृत्य-संगीत ने पूरे वातावरण को उत्सव के रंग में सराबोर कर दिया।मान्यता है कि बाहा पर्व के बिना सखुआ के फूलों और नए पत्तों का उपयोग वर्जित होता है। इस सफल आयोजन के माध्यम से नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और प्राकृतिक विरासत से जोड़ने का प्रयास किया गया।
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