डायन के नाम पर विवाद सामाजिक कलंक : सिविल सर्जन
झारखंड में अंधविश्वास और डायन के आरोपों को खत्म करने के लिए जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। जिला कुष्ठ परामर्शी डॉ. राजीव लोचन महतो ने बताया कि महिलाओं, खासकर विधवाओं को डायन बताकर प्रताड़ित किया जाता है। सामाजिक हिंसा को रोकने के लिए वैज्ञानिक सोच और शिक्षा की आवश्यकता है।

लोगों का अंधविश्वास दूर करने को लेकर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें जिले भर के बहुद्देशीय कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित किया गया। जिला कुष्ठ परामर्शी डॉ. राजीव लोचन महतो ने बताया कि संपत्ति विवाद, परिवारिक झगड़े या व्यक्तिगत दुश्मनी को सुलझाने के लिए भी डायन का आरोप लगाया जाता है। महिलाओं, विशेष रूप से विधवा या अकेली महिलाओं को निशाना बनाकर सामाजिक बहिष्कार या सम्पत्ति हड़पने के लिए डायन कहकर प्रताड़ित किया जाता है। स्थानीय परंपराओं और रीति-रिवाजों में जादू-टोना और डायन से संबंधित विश्वासों का गहरा प्रभाव है। हमलोगों के समाज में ओझा या तांत्रिकों द्वारा डायन के रूप में चिह्नित करना सामाजिक हिंसा को बढ़ावा देता है।
सिविल सर्जन डॉ. साहिर पाल ने कहा कि डायन के नाम पर हिंसा सामाजिक कलंक है। इसके उन्मूलन में ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में वैज्ञानिक सोच और शिक्षा का अभाव होना और साथ में जागरूकता अभियानों का प्रभाव सीमित होना भी रुकावट पैदा करते हैं। उन्होंने कहा कि डायन प्रथा एक गंभीर सामाजिक कुरीति और हिंसा का रूप है, जिसे खत्म करने के लिए झारखंड ने भी साल 2001 में कड़े कानून बनाए हैं। स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम में उपस्थित जिला कुष्ठ परामर्शी डॉ. राजीव ने कहा कि हम सबको मिलकर डायन प्रथा को खत्म करने के लिए दृढ़ संकल्प लेना होगा।
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