डेढ़ सौ एकड़ की प्रायोगिक खेती मात्र तीन वैज्ञानिकों के भरोसे
पूर्वी सिंहभूम के क्षेत्रीय कृषि अनुसंधान केंद्र में 150 एकड़ भूमि शोध के लिए है, लेकिन केवल तीन वैज्ञानिक कार्यरत हैं। कई विभागों में वैज्ञानिकों की कमी के कारण शोध कार्य प्रभावित हो रहा है। केंद्र में कई एकड़ जमीन बेकार पड़ी है और कर्मचारियों की कमी से किसानों को लाभ नहीं मिल पा रहा है।

पूर्वी सिंहभूम के क्षेत्रीय कृषि अनुसंधान केंद्र के पास करीब 150 एकड़ खेत शोध के लिए है, लेकिन वहां मात्र तीन वैज्ञानिक ही कार्यरत हैं। ऐसे में सिर्फ कुछ खेतों का ही शोध कार्य हो पा रहा है। झारखंड में कुल तीन क्षेत्रीय कृषि अनुसंधान केंद्र हैं, जिनमें पलामू, दुमका और पूर्वी सिंहभूम (दारिसाई) शामिल हैं। 1987 में स्थापित इस केंद्र को 200 एकड़ भूमि आवंटित की गई थी। इसमें कार्यालय, अतिथि आवास, प्रशिक्षण केंद्र, केवीके भवन आदि हैं, बाकी जगह शोध के लिए है। 12 वैज्ञानिक पद स्वीकृत हैं, लेकिन इन पर सिर्फ तीन वैज्ञानिक कार्यरत हैं।
वैज्ञानिकों की कमी
एसोसिएट डायरेक्टर के अलावा एग्रो फॉरेस्ट्री, एग्रीकल्चर इंजीनियरिंग और एग्रोनॉमी के ये तीन वैज्ञानिक ही काम संभाल रहे हैं। एनिमल हस्बंड्री, स्वायल साइंस, जेनेटिक्स एवं प्लांट ब्रीडिंग, प्लांट पैथोलॉजी जैसे कई महत्वपूर्ण विभागों में वैज्ञानिक न होने से काम ठप पड़ा है। केंद्र में कई एकड़ जमीन बेकार पड़ी है और पॉली हाउस भी टूट गया है। इसी परिसर में स्थित कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) की भी यही स्थिति है। यहां केवीके इंचार्ज के अलावा मात्र दो वैज्ञानिक हैं। प्रशिक्षण व अन्य कार्य हो रहे हैं, लेकिन कर्मचारियों की कमी से किसानों को पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है।
काम प्रभावित
क्षेत्रीय कृषि अनुसंधान केंद्र के डॉ. नजरुस्सलाम ने बताया कि वैज्ञानिकों की कमी के कारण काफी काम प्रभावित हो रहा है। करीब दस वर्षों से ये पद खाली हैं। इसके लिए मुख्यालय को कई बार पत्र लिखा जा चुका है।
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