दो गांवों में पसरा सन्नाटा, दो आंगन से उठीं छह अर्थियां, न जला चूल्हा, न थमे आंसू
गया जिले के आमस प्रखंड के मसुरीबार गांव में एक सड़क हादसे ने एक ही परिवार की तीन पीढ़ियों को समाप्त कर दिया। दादा और पोते का शव लौटते समय एक ही समय में पति-पत्नी और उनकी दो बेटियों के शव भी आए, जिससे पूरे गांव में मातम छा गया। यह घटना सभी के लिए एक गहरी शोक की लहर लेकर आई।

चौपारण। कहते हैं काल जब आता है तो पूरा परिवार समेट लेता है, लेकिन गया जिले के आमस प्रखंड के मसुरीबार गांव में जो हुआ, उसने नियति की क्रूरता की सारी हदें पार कर दीं। दनुआ घाटी के सड़क हादसे ने इस गांव के एक ही परिवार की तीन पीढ़ियों को सदा के लिए सुला दिया। रविवार शाम जब चौपारण से आमस एंबुलेंस पहुंची, तो पूरा इलाका चीत्कारों और चीख-पुकार से दहल उठा। शाम करीब 4 बजे जैसे ही दादा और पोते का शव पहुंचा, गांव का हर शख्स फूट-फूट कर रोने लगा। वही 20 मिनट दूसरे गांव जब पति, पत्नी और दो मासूम बच्चियों के शव पहुंचे, तो मंजर इतना खौफनाक और दुखद था कि देखने वालों की रूह कांप गई।
एक ओर दादा-पोते की चिता सजी, तो दूसरी ओर कुछ ही दूरी पर पति-पत्नी और उनकी दो बेटियों का एक साथ अंतिम संस्कार किया गया। शव यात्रा में शामिल हर किसी की आंखें नम थी। आंसुओं से पूरा माहौल गमगीन था।इलाज कराने गए थे, लाश बनकर लौटे बताया जाता है कि बुजुर्ग कीर्ति मांझी अपने पोते प्रेम कुमार के साथ इलाज के लिए धनबाद अपनी बेटी-दामाद के पास गए थे। किसे पता था कि यह सफर आखिरी साबित होगा। घर लौटने की खुशी चंद पलों में मातम में बदल गई।बेसुध मां और सूना पड़ा गांव अपने जिगर के टुकड़े मासूम प्रेम कुमार के शव से लिपटकर मां बार-बार अचेत हो जा रही थी। पूरे गांव में बीते 24 घंटों से किसी भी घर में चूल्हा नहीं जला है। ग्रामीण स्तब्ध हैं कि आखिर ईश्वर इतना निष्ठुर कैसे हो सकता है कि एक ही झटके में हंसता-खेलता पूरा संसार उजाड़ दे। गांव की मिट्टी भी रो रही है। जिस आंगन में बच्चों की किलकारियां गूंजनी चाहिए थी, वहां से आज छह-छह अर्थियां एक साथ निकलीं। यह सिर्फ एक हादसा नहीं, एक हंसते-खेलते परिवार का अंत है जिसे यह गांव कभी नहीं भूल पाएगा।
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