मनरेगा कर्मियों के अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले जाने से विकास योजनाएं हुई प्रभावित
हजारीबाग में मनरेगा कर्मियों की अनिश्चितकालीन हड़ताल से योजनाएं प्रभावित हुई हैं। 1,83,672 मजदूरों में से केवल 705 को काम मिला है। कर्मियों की मांगें हैं: स्थायी नौकरी, समान काम के लिए समान वेतन, और बकाया मानदेय का भुगतान। हड़ताल से ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ा है।

हजारीबाग, निज प्रतिनिधि। मनरेगा कर्मियों का अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने से योजनाएं पूरी तरह से प्रभावित हो गया है। यही कारण है कि एक लाख 83 हजार 672 निबंधित मजदूरों में से मात्र 705 मजदूरों को ही काम मिल पाया है। जबकि अन्य मजदूर काम के अभाव में दूसरे राज्यों में पलायन कर रहे हैं । झारखंड राज्य मनरेगा कर्मचारी संघ द्वारा शुरू की गई अनिश्चितकालीन हड़ताल का ग्रामीण विकास और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर गहरा असर पड़ रहा है। जिला अध्यक्ष जितेन्द्र कुमार सिंह ने बताया कि मनरेगा कर्मियों में बीपीओ, जेई, और रोजगार सेवक के काम बंद करने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाने वाली यह योजना पूरी तरह ठप हो गई है।
मनरेगा के तहत होने वाले नए कार्यों जैसे तालाब निर्माण, डोभा, बागवानी और मेढ़ बंदी की प्रशासनिक और तकनीकी स्वीकृति रुक गई है। बिना जेई और रोजगार सेवक के नई योजनाएं जमीन पर नहीं उतर पाएंगी। मजदूरों की उपस्थिति दर्ज करने और मस्टर रोल निकालने का काम पूरी तरह डिजिटल होता है, जिसे रोजगार सेवक संभालते हैं जो अभी हड़ताल की वजह से यह प्रक्रिया रुक गई है। इस मौके पर राजीव इन्द्र गुरु ने कहा कि मनरेगा में मजदूरी का भुगतान एक निश्चित समय सीमा के भीतर होना अनिवार्य है लेकिन कर्मियों की अनुपस्थिति में जेनरेट नहीं हो पाएंगे, जिससे हजारों मजदूरों के मानदेय में देरी हो रही है । जियो टैगिंग और ऑनलाइन डेटा एंट्री का काम पूरी तरह से ठप हो गया है। इससे राज्य और केंद्र सरकार को भेजी जाने वाली रिपोर्टिंग रुक गई है। उन्होंने कहा कि कर्मियों की मांग है कि उन्हें संविदा के बजाय स्थाई किया जाए, समान काम समान वेतन के सिद्धांत को लागू करने की मांग की है। भविष्य निधि बीमा और अन्य पेंशन लागू की कमी बिना सुरक्षा के चेक पोस्ट और दंडाधिकारी ड्यूटी लगाए जाने का भी विरोध किया है।मनरेगा कर्मियों ने कहा कि वर्ष 2007 में मनरेगा योजना के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए झारखंड सहित देश के कई राज्यों में ग्राम रोजगार सेवकों की नियुक्ति संविदा के आधार पर की गई। वर्ष 2008 में प्रखंड कार्यक्रम पदाधिकारी, तकनीकी सहायक, लेखा सहायक एवं कंप्यूटर सहायक जैसे पदों पर भी संविदा बहाली हुई। उस समय रोजगार सेवकों का मानदेय मात्र 3500 रुपये निर्धारित किया गया था। राज्य में बेरोजगारी के कठिन दौर में शिक्षित युवाओं ने इस अवसर को स्वीकार किया और अपने जीवन के महत्वपूर्ण वर्षों को इस योजना के क्रियान्वयन में लगा दिया। उन्हें उम्मीद थी कि भविष्य में सरकार उनकी सेवा को स्थायित्व देगी, लेकिन यह उम्मीद वर्षों बाद भी अधूरी ही रही। कई बार आंदोलन करने के बाद सरकार ने रोजगार सेवक का मानदेय बढ़ाकर 12 हजार रुपये किया गया, परंतु वर्तमान महंगाई के अनुरूप यह पर्याप्त नहीं है। कर्मियों ने कहा कि तकनीकी बदलावों और डिजिटलीकरण के इस दौर में मनरेगा कार्यों की जटिलता और जिम्मेदारियां भी बढ़ी हैं। इसके बावजूद मानव संसाधन और सुविधाओं में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ। कई कर्मियों को अपने गृह प्रखंड से दूर कार्य करना पड़ता है, जिससे आवागमन के दौरान दुर्घटनाओं और असामयिक मृत्यु के मामले भी सामने आए हैं। कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण इलाज के अभाव में कई मनरेगा कर्मियों की मृत्यु हो गई है। दुखद पहलू यह है कि सामाजिक सुरक्षा नीति के अभाव में उनके परिवारों को किसी प्रकार की सहायता नहीं मिल पाई। वित्तीय पक्ष पर नजर डालें तो मनरेगा का बजट भी कई सवाल खड़े करता है। वर्ष 2025-26 में झारखंड राज्य के लिए मनरेगा के तहत लगभग 12 करोड़ मानव दिवस सृजन का लक्ष्य निर्धारित किया गया था जो लगभग पूरा कर लिया गया है। वर्तमान वर्ष 2026 में मनरेगा कर्मियों के सामने कई गंभीर समस्याएं एक साथ खड़ी हैं छह महीने से अधिक का बकाया मानदेय, 2024 के आंदोलन में किए गए वादों का अधूरा रहना, स्थायी समायोजन और सामाजिक सुरक्षा की लंबित मांगें और नई योजना के कारण उत्पन्न असुरक्षा।जिलाध्यक्ष ने दावा किया कि इस हड़ताल का व्यापक असर राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। लगभग 34.4 लाख जॉब कार्डधारी परिवारों और 40.44 लाख श्रमिकों का रोजगार प्रभावित हुआ है। रोजगार के अभाव में पलायन की खबरें एक बार फिर सामने आने लगी हैं। मनरेगा जैसी योजना को जमीन पर सफल बनाने वाले इन कर्मियों की अनदेखी न केवल उनके भविष्य को संकट में डालती है, बल्कि राज्य के विकास की गति को भी प्रभावित करती है। अब आवश्यकता इस बात की है कि सरकार ठोस और दूरगामी नीति बनाकर इन समस्याओं का समाधान करे, ताकि भरोसे का यह संकट समाप्त हो और व्यवस्था में स्थायित्व आ सके।मनरेगा कर्मी इन प्रमुख मांगों को लेकर पिछले 12 मार्च से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर हैं। मनरेगा कर्मी का पहली मांग रांची मनरेगा कोषांग में मनरेगा से नियुक्त कर्मी को ग्रेड पे दिया जाता है जबकि हम सभी क्षेत्रीय कर्मी को ग्रेड पे नहीं दिया जाता है। इसलिए हम सभी क्षेत्रीय कर्मी को अविलंब ग्रेड पे लागू किया जाए। इसी प्रकार दूसरी मांग पिछले ग्रामीण विकास मंत्री इरफान अंसारी के समय में हुए समझौता में हम सभी के मानदेय में 30 प्रतिशत वृद्धि एवं साथ ही साथ सामाजिक सुरक्षा तत्काल लागू करने की सहमती बनी थी परंतु इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी इसे लागू नहीं किया गया। जिसके कारण पूरे राज्य के मनरेगा कर्मी में आक्रोश की स्थिति उत्पन्न हो गई है। वहीं तीसरी मांग में विगत अक्तूबर 2025 से हजारीबाग जिले के मनरेगा कर्मी का मानदेय का भुगतान नहीं किया जा रहा है जिसमें सभी मनरेगा कर्मियों के समक्ष पारिवारिक भरण पोषण में काफी विकट स्थिति आ गई है मनरेगा कर्मियों की मांग है कि तत्काल हमारा अद्यतन मानदेय का भुगतान किया जाए । चौथी मांग बर्खास्त मनरेगा कर्मियों को वापस लिया जाए और पांचवें मांग सभी मनरेगा कर्मी विगत 17- 18 वर्ष से मनरेगा का काम कर रहे हैं इसलिए इन्हें ग्रामीण विकास विभाग में समायोजन करते हुए परमानेंट किया जाए।
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