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इंतजार की घड़ियां खत्म, दाम्पत्य जीवन में बंधने लगे लोग

शादी को लेकर हरिहरधाम मंदिर में लगने लगी भीड़ आरक्षित धर्मेन्द्र पाठक बगोदर। युगल- जोड़ियों और उनके परिजनों को शादी- ब्याह का इंतजार की घड़ियां अब...

इंतजार की घड़ियां खत्म, दाम्पत्य जीवन में बंधने लगे लोग
हिन्दुस्तान टीम,गिरडीहWed, 29 Nov 2023 02:15 AM
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धर्मेन्द्र पाठक
बगोदर। युगल- जोड़ियों और उनके परिजनों को शादी- ब्याह का इंतजार की घड़ियां अब खत्म हो गई है। वैवाहिक शुभ मुहूर्त शुरु होते ही युगल- जोड़े एक- दूजे के होने लगे हैं। चट मंगनी पट ब्याह के लिए चर्चित बगोदर के प्रसिद्ध शिव मंदिर हरिहरधाम की बात करें तब यहां भी शहनाईयां बजने लगी है। शादी-ब्याह के लिए 28 नवंबर से यहां की धर्मशालाएं बुक हो गई है। मंदिर के बाहर के मैरेज हॉल में 27 नवंबर से ही शादी- ब्याह होने लगी है।

इधर, वैवाहिक मुहूर्त शुरु होते ही मंदिर परिसर में भीड़ उमड़ने लगी है। मंदिर के प्रबंधक भीम यादव ने बताया कि 28 नवंबर से मंदिर की धर्म शालाएं शादी- ब्याह के लिए बुक है, जो 15 दिसंबर तक लगातार बुक ही है। उन्होंने बताया कि मंदिर परिसर में बाल विवाह पर प्रतिबंध है। विवाह के लिए यहां रजिस्ट्रेशन कराने के समय युगल- जोड़े को बर्थ सर्टिफिकेट जमा करना पड़ता है। बताया कि वर पक्ष के लिए 550 एवं वधू पक्ष के लिए 250 रुपया रजिस्ट्रेशन शुल्क यहां निर्धारित है। इधर ठाकुर प्रसाद कैलेंडर के अनुसार 23 नवंबर से वैवाहिक मुहूर्त की शुरुआत हुई है जो इस साल के आखिरी महीना दिसंबर के 15 तारीख तक मुहूर्त है। इस बीच नवंबर में 24, 27, 28, 29 एवं दिसंबर में 5, 6, 7, 8, 9, 11 एवं 15 दिसंबर शादी ब्याह के लिए शुभ मुहूर्त है।

शिव मंदिर हरिहरधाम की है अनोखी कहानी

बगोदर प्रखंड स्थित अनोखे शिव मंदिर हरिहरधाम की कहानी भी अनोखी है। मंदिर का आकार शिव लिंगाकार होने के कारण यह मंदिर अपने आप में अनोखा है। इसके अलावा मंदिर की ऊंचाई भी 65 फीट है, जो दूर से ही दिखाई देता है। मंदिर का इतिहास पश्चिम बंगाल से जुड़ा हुआ है। पश्चिम बंगाल निवासी बाबा अमरनाथ मुखोपाध्याय के द्वारा मंदिर का निर्माण कराया गया है। बताया जाता है कि वे काफी विद्धान थे। बंगाल में जज के पद पर नियुक्त थे। बताया जाता है कि सांसारिक मोहमाया को त्याग करते हुए उन्होंने चारों धाम की यात्रा के लिए पदयात्रा पर निकले थे। पदयात्रा के दौरान वे बगोदर में रुके थे और उन्हें उस समय वह स्थान पसंद आ गया था जहां मंदिर बनाया गया है। इसके बाद लोगों के सहयोग से उन्होंने इस मंदिर का निर्माण कार्य पूरा कराया। मंदिर निर्माण कार्य पूरा होने के बाद 1988 में महायज्ञ के साथ मंदिर का प्राण प्रतिष्ठा किया गया और फिर यहां श्रद्धालुओं के द्वारा पूजा- अर्चना शुरू की गई। कलाकार कितना पारखी होता है यह बात भी इस मंदिर की बनावट से पता चलता है।

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