
ग्रामीण क्षेत्रों में समूह ऋण को त्रासदी बनने से रोके प्रशासन
संक्षेप: ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं को दिए जा रहे समूह ऋण से समस्याएं बढ़ रही हैं। घरेलू विवाद, आत्महत्या और भागने को मजबूर होना जैसी घटनाएं आम हो गई हैं। कंपनियों द्वारा उच्च ब्याज दरों पर ऋण दिए जा रहे हैं, जिससे महिलाएं कर्ज के जाल में फंस रही हैं। ऐसी स्थिति में महिलाओं का आर्थिक शोषण हो रहा है।
रेम्बा, प्रतिनिधि। महिलाओं के बीच दिया जा रहा समूह ऋण ग्रामीण क्षेत्रों में त्रासदी बनती जा रही है। घरेलू विवाद तथा हिंसा, आत्महत्या, भागने को मजबूर जैसी समस्याएं दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। यदि यही स्थिति रही तो कंपनियों के खिलाफ उत्पन्न जनाक्रोश से कभी भी विधि व्यवस्था का संकट उत्पन्न होने से इनकार नहीं किया जा सकता। यहां यह बता दें कि जिले के विभिन्न प्रखंडों में दर्जनाधिक कंपनियां हैं जो महिलाओं का समूह बनाकर उन्हें लोन उपलब्ध कराती हैं। उक्त कार्यों में शामिल कंपनियां ब्याज की ऊंची दरों पर कार्य कर रही हैं। ऋण देकर अगले दिन या सप्ताह से किस्त वसूली शुरू हो जाती है।

ऋण और उसके वसूली की जवाबदेही ग्रुप में शामिल स्थानीय महिला सदस्यों की होती है। किसी कारणवश कोई सदस्य यदि ऋण की किस्त देने में विफल रहती है तो स्थानीय महिलाओं के दबाव में उन्हें घर के सामानों को बंधक रखकर या फिर महाजनों से ऊंची दर पर ऋण लेकर देना पड़ता है। जिससे वे कर्ज के कीचड़ में धंसती चली जाती है। बताया जाता है कि गरीब परिवार कंपनियों के निशाने पर रहता है, ताकि वे अपनी मनमानी कर सके। सामाजिक सरोकारों से जुड़े लोगों का मानना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में कथित रूप से कानून की आड़ में गरीब महिलाओं का आर्थिक शोषण किया जा रहा है। ग्रामीण महिलाओं ने ऐसी कंपनियों से बचाने की गुहार लगाई है। कई बार कंपनी कर्मी ऋणधारकों की सरेआम बेइज्जत भी करते हैं। कई बार कड़ा तगादा से बचने के लिए महिलाएं घर-द्वार छोड़ देती हैं। कई बार वे छिपने को मजबूर हो जाती हैं। कई बार तो महिला आत्महत्या तक लेती हैं। ग्रामीण महिलाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि ऐसी कंपनियों पर ऋणधारकों से किए जा रहे बर्ताव में सुधार लाने की जरुरत है।

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