लंगटा बाबा मेला की तैयारियां पूरी, कल चादरपोशी करेगें लाखों भक्त
जमुआ प्रखंड के खरगडीहा में लंगटा बाबा की समाधि सभी धर्मों के लोगों के लिए श्रद्धा का केंद्र है। हर साल पौष पूर्णिमा पर श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ता है। लंगेश्वरी बाबा ने 1910 में महासमाधि ली थी, और उनके चमत्कारों के कारण भक्तों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है।
रामचन्द्र/शुभम जमुआ। जमुआ प्रखंड मुख्यालय से सात किमी दूर देवघर मुख्य मार्ग के किनारे खरगडीहा स्थित लंगटा बाबा की समाधि पर सभी धर्म के लोगों की अटूट श्रद्धा है। यही वजह है कि प्रतिदिन हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी धर्मों के लोग यहां आकर माथा टेकते हैं। लेकिन प्रत्येक वर्ष पौष पूर्णिमा के दिन यहां भक्ति व आस्था का जन सैलाब उमड़ पड़ता है। विभिन्न राज्यों के श्रद्धालु चादरपोशी करने यहां पहुंचते हैं। हिन्दू सुबह तो मुस्लिम समुदाय के लोग दोपहर बाद चारदपोशी करते रहे हैं। 1910 में ली थी महासमाधि कालजयी संत लंगेश्वरी बाबा उर्फ लंगटा बाबा ने वर्ष 1910 में महासमाधि में प्रवेश किया था।
तब से लेकर अब तक बाबा के भक्तों की संख्या में काफी इजाफा हुआ है। लंगटा बाबा के खरगडीहा आगमन के बारे में कहा जाता है कि 1870 के दशक में नागा साधुओं की एक टोली के साथ वे यहां पहुंचे थे। उस वक्त खरगडीहा परगना हुआ करता था। कुछ दिन के पड़ाव के बाद नागा साधुओं की टोली अपने गंतव्य की ओर रवाना हो गयी, लेकिन एक साधु थाना परिसर में ही नंग-धड़ंग अवस्था में धूनी रमाये बैठा रहा। कालांतर में अपने चमत्कारिक गुणों के कारण यही साधु लंगटा बाबा के नाम से विख्यात हुआ। ले महाराज तें भी खा ले... बाबा की अद्भुत शक्तियों के बारे में बताया जाता है कि एक दिन एक कुत्ता इनके पास आया उसका शरीर जख्मों से भरा हुआ था। शरीर से बह रहे मवाद को देखकर उन्होंने उसके पास कुछ फेंका और कहा ले महाराज तें भी खा ले। खाते ही कुत्ता पूरी तरह निरोग हो गया। लंगेश्वरी बाबा सिर्फ पीड़ित मानवता के लिए ही नहीं बल्कि समस्त प्राणियों के लिए दया की मूर्ति थे। उनके समय में एक बार खरगडीहा में भंयकर रूप से प्लेग रोग फैला। लोग अपने अपने घरों को छोड़कर भागने लगे। बाबा के सेवक भी भागने की तैयारी में थे। तभी उन्होंने कहा-देखो यहां पर दवाओं से भरा है। इसके बाद क्षेत्र में प्लेग रोग समाप्त हो गया था। कहते हैं कि श्रद्धालुओं से प्राप्त खाने पीने या अन्य सामान को उनके स्वीकार करने के तरीके भी नायाब थे। बाबा जिसे स्वीकार नहीं करते उसे ठंडी करो महाराज की आज्ञा के साथ एक कुएं में फेंकवाते थे। वह कुआं आज भी समाधि परिसर में है। वर्ष 1910 में पौष पूर्णिमा के दिन जीव आत्माओं के साधक संत लंगटा बाबा ने अपना भौतिक शरीर का त्याग किया था। इस वक्त क्षेत्र के हिन्दू एवं मुसलमानों को ऐसा लग रहा था कि उनका सब कुछ लूट गया। बाबा के शरीर के अंतिम संस्कार के लिए भी दोनों समुदाय के लोग आपस में उलझ पड़े थे। बताते हैं कि तब क्षेत्र के प्रबुद्ध लोगों ने विचार विमर्श के बाद दोनों धर्म के रीति रिवाज से अंतिम संस्कार किया था। उसके बाद से प्रत्येक वर्ष पौष पूर्णिमा के दिन यहां मेला लगता है। बाबा का खरगडीहा आगमन सन् 1870 ई0 के आस-पास में नागा साधुगण का एक चलता फिरता अखाड़ा जमात के रूप में खरगडीहा होकर गुजरा जिसमें हाथी, घोड़े, ऊंट भी साथ में थे। पूज्य बाबा इसी तरह के एक जमात के साथ खरगडीहा आए। जमात आगे बढ़ गई और बाबा यहीं रह गए। रोशनी कौंधी और ब्रह्मलीन हो गए सोमवार का दिन था और उस दिन पौष-पूर्णमा थी। बहुत आग्रह करने के बाद भी उस दिन लंगटा बाबा ने भोजन ग्रहण नहीं किया। दिन के 2 बजे थे। बाबा टहलते हुए थाना कार्यालय के बरामदे की ओर आ रहे थे। उनके पीछे खेदन बाबा, लंगटा बाबा के लिए हुक्का तैयार कर आ रहे थे। बाबा अचानक बरामदे के नजदीक मैदान में बैठ गए और करवट लेटने के प्रयास में थोड़ा दाहिनी और झुके। दारोगा वहाउद्दीन खान बरामदे के निकट खड़े थे। एकाएक बाबा के शरीर से चारों और बिजली की रोशनी सी कौंध गई और बाबा सदा के लिए जमीन पर लेटकर ब्रह्मलीन हो गए। खेदन बाबा उस प्रकाश से स्तब्ध रह गए। खेदन बाबा दौड़कर लंगटा बाबा के निकट आए और घबराते हुए पुकारने लगे-बाबा तंबाकू पी लैई, बाबा तंबाकू पी लैई- बड़ा दारोगा ने कहा- तू किसको पुकारता है, बाबा तो चल दिए, तुमने अभी देखा नहीं क्या। पहली चादरपोशी करते हैं थाना प्रभारी यह स्थान पूर्व में खरगडीहा थाना हुआ करता था। बाद में थाना जमुआ में बना। खरगडीहा थाना के तत्कालीन थाना प्रभारी वहाबुद्दीन खान भी लंगटा बाबा के परम भक्त थे। बाबा की देख-रेख में कमी नहीं करते इसलिए पहली चादरपोशी का अधिकार भी यहां के थाना प्रभारी को मिला और समाधि के बाद से निरंतर जमुआ थाना प्रभारी ही पहली चादरपोशी करते हैं। कई राज्यों से आते हैं बाबा के भक्त झारखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा आदि राज्यों से बाबा के भक्त पौष पूर्णिमा के दिन यहां आते हैं। इस अवसर पर सुरक्षा के पुख्ता प्रबंध किये जाते हैं। आनेवाले भक्तों में उद्योगपति, कारोबारी, न्यायिक पदाधिकारी, सरकारी अधिकारी, कर्मी आदि शामिल रहते हैं। सीसीटीवी कैमरा से होगी निगेहबानी मेला में श्रद्धालुओं की भीड़ को नियंत्रित करने के लिए बैरिकेडिंग रहेगी। मेला की निगेहबानी सीसीटीवी कैमरा से की जाएगी। मेला के दिन चार पहिया वाहनों को समाधि परिसर से एक किलोमीटर पहले दोनों तरफ रोकने का निर्णय लिया गया है। तैयारी जोरों से चल रही हैं।

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