Gridih News: चरित्र निर्माण के लिए सात्विकता और अच्छा वातावरण जरुरी: मुनि श्री प्रमाण सागर
Gridih News: व्यक्ति का चरित्र उसके वातावरण, संगति, भाषा, आहार और विचारों से निर्मित होता है। मुनि प्रमाण सागर जी ने कहा कि युवा वर्ग को अपने संस्कारों का ध्यान रखकर सात्विक जीवनशैली अपनानी चाहिए। स्वास्थ्य के लिए संतुलित आहार और सकारात्मक विचार महत्वपूर्ण हैं। रक्तचाप और बुरी आदतों से दूर रहना बुद्धिमानी है।

Gridih News: चरित्र निर्माण के लिए सात्विकता और अच्छा वातावरण जरुरी: मुनि श्री प्रमाण सागर पीरटांड़, प्रतिनिधि। व्यक्ति का चरित्र उसके वातावरण, संगति, भाषा, आहार और विचारों से निर्मित होता है। युवा वर्ग यदि अपनी संस्कृति, मर्यादा और विवेक से समझौता करेगा तो उसका भविष्य संकट में पड़ सकता है। ऐसे में सात्विक जीवनशैली को अपनाना वर्तमान समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उक्त बातें श्री सम्मेद शिखरजी स्थित गुणायतन में आयोजित प्रातःकालीन धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि प्रमाण सागर जी ने कहीं।
धर्मसभा में प्रवचन
ज्ञात रहे कि वर्षाकालीन चातुर्मास में साधनारत मुनि प्रमाण सागर जी महाराज के सानिध्य में धर्मसभा में प्रवचन की गंगा बह रही है। साधु संतों के सानिध्य में श्रावक-श्राविका भक्ति की गंगा में डुबकी लगा रहे हैं। श्रद्धालु शांतिधारा, अभिषेक पूजा, आराधना व प्रवचन को आत्मसात करने में जुटे हैं। धर्मसभा में मुनि प्रमाण सागर जी महाराज ने कहा कि गलत संगति के कारण वह गाली-गलौज, नशे और अन्य बुरी आदतों का शिकार हो जाते हैं। एक युवक ने स्वयं स्वीकार किया कि कॉलेज के वातावरण में आधुनिक दिखने की चाह में उसने अपने संस्कारों से समझौता कर लिया। मुनि श्री ने कहा कि यह केवल एक युवक की कहानी नहीं, बल्कि आज के अनेक युवाओं की वास्तविक स्थिति है। जहां संस्कार कमजोर पड़ने लगें, मर्यादाएं समाप्त होने लगें और चरित्र पर आंच आने लगे, वहां के वातावरण और संगति से तत्काल दूरी बना लेना ही बुद्धिमानी है।
स्वस्थ भोजन का महत्व
भोजन स्वाद के लिए नहीं, स्वस्थ जीवन के लिए हो
मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि सात्विकता केवल पहनावे तक सीमित नहीं है। यह व्यक्ति के भोजन, विचार, वाणी और व्यवहार में भी दिखाई देना चाहिए। आज फास्ट फूड, जंक फूड और असंतुलित खान-पान के कारण स्वास्थ्य संबंधी अनेक समस्याएं बढ़ रही हैं। उन्होंने कहा कि भोजन स्वाद के लिए नहीं, बल्कि स्वस्थ और संतुलित जीवन के लिए होना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं से यह प्रश्न करना चाहिए कि वह जीने के लिए खा रहा है या खाने के लिए जी रहा है। उन्होंने कहा कि आवश्यकता से अधिक भोजन करना भी शरीर के प्रति अन्याय है। अनुचित और अधिक भोजन को पचाने में शरीर की ऊर्जा व्यर्थ होती है तथा शरीर में अवांछित तत्व अनेक परेशानियों का कारण बन सकते हैं। इसलिए संयमित, संतुलित और सात्विक आहार स्वस्थ शरीर, शांत मन और प्रसन्न जीवन का आधार है। मुनि श्री ने कहा कि शिक्षा तभी सार्थक है, जब वह मनुष्य के भीतर विवेक का विकास करे। तंबाकू और गुटखे जैसे नशीले पदार्थों पर स्पष्ट स्वास्थ्य चेतावनी लिखी होने के बावजूद उनका सेवन करना विवेकहीनता का परिचायक है। केवल डिग्रियां प्राप्त कर लेना ही बुद्धिमत्ता नहीं है, बल्कि सही और गलत का निर्णय लेकर सही मार्ग को जीवन में अपनाना ही वास्तविक शिक्षा है। उन्होंने युवाओं को दुनिया की अंधी दौड़ का अनुसरण करने के बजाय अपने लक्ष्य, संस्कार और जीवन-मूल्यों पर ध्यान केंद्रित करने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में मीडिया और सामाजिक वातावरण हमारे विचारों को गहराई से प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे में सात्विक साहित्य, श्रेष्ठ संगति, स्वाध्याय और सकारात्मक चिंतन के माध्यम से मन को निर्मल बनाए रखना आवश्यक है।
सात्विक जीवन के गुण
मुनि श्री ने कहा कि सात्विक जीवन का अर्थ केवल शुद्ध भोजन करना नहीं है, बल्कि शुद्ध विचार, शुद्ध व्यवहार, शुद्ध वाणी और श्रेष्ठ संगति भी सात्विक जीवन के अभिन्न अंग हैं। जब मनुष्य इन गुणों को अपने जीवन में आत्मसात करता है, तभी उसका व्यक्तित्व संतुलित, स्वस्थ और संस्कारित बनता है तथा वह समाज के लिए प्रेरणास्रोत बन सकता है।
फोटो 08 जीआरडी 61 भक्ति भावना में लीन श्रद्धालु।
62 मुनि श्री से आशीर्वाद लेते श्रद्धालु।


