उग्रवाद-अपराध पर नियंत्रण पर गावां में अब भी कई चुनौतियां
झारखंड राज्य के गठन के बाद गावां प्रखंड में बड़ा बदलाव आया है। पहले उग्रवाद और अपराध से त्रस्त, अब यह क्षेत्र शांति और सुरक्षा का प्रतीक बन गया है। सड़क और पुलों के निर्माण से आवागमन सुगम हुआ है, लेकिन चिकित्सा, शिक्षा और रोजगार के क्षेत्रों में अभी भी विकास की आवश्यकता है।
बसंत, गावां। झारखंड राज्य गठन के बाद बीते ढाई दशकों में गावां प्रखंड की तस्वीर में बड़ा बदलाव आया है। कभी उग्रवाद और अपराध के साए में जीने को मजबूर यह इलाका आज शांति और सुरक्षा के माहौल में सांस ले रहा है। सड़क-पुलों के निर्माण से आवागमन सुगम हुआ है और अधिकांश गांव मुख्य पथ से जुड़ चुके हैं। बावजूद इसके, चिकित्सा, शिक्षा, सिंचाई और रोजगार जैसे बुनियादी क्षेत्रों में गावां आज भी विकास की राह ताक रहा है। राज्य गठन से पहले बदहाल थी स्थिति : अलग राज्य बनने से पहले गावां प्रखंड की हालत बेहद दयनीय थी। प्रखंड मुख्यालय को छोड़ शेष पंचायतें मुख्य सड़क से कटी हुई थी।
लोगों को पैदल या साइकिल से जोखिम भरा सफर तय कर मुख्यालय पहुंचना पड़ता था। बरसात के दिनों में सकरी नदी उफान पर आ जाता था। गावां, माल्डा, पसनौर, चरकी और सेरुआ जैसे गांव टापू में तब्दील हो जाते थे। गर्भवती महिलाओं और गंभीर रूप से बीमार मरीजों का इलाज कराना लगभग असंभव हो जाता था। अपराध और उग्रवाद से त्रस्त थे लोग : उस दौर में क्षेत्र अपराध और उग्रवाद की चपेट में था। चोरी, डकैती और अपहरण की घटनाएं आम थीं। लोग दिन के उजाले में भी घर से बाहर निकलने में संकोच करते थे। प्रखंड सह अंचल कार्यालय परिसर स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र से दो चिकित्सकों का अपहरण कर लिया गया था, जिनमें से एक चिकित्सक की कथित तौर पर हत्या कर दी गई। शव तक बरामद नहीं हो सका। पिहरा-माल्डा और पिहरा-ढाब पथ पर सप्ताह में एक-दो बार वाहनों को रोककर लूटपाट आम बात थी। पुलिस उग्रवादियों के सामने बेबस नजर आती थी और पंचायतों तक जाना उनके लिए भी आसान नहीं था। क्षेत्र में उग्रवादियों की समानांतर सरकार चलती थी। प्रखंड कार्यालय परिसर स्थित माल गोदाम और सामुदायिक भवन को विस्फोट कर ध्वस्त कर दिया गया था, वहीं प्रखंड सह अंचल कार्यालय को आग के हवाले कर दिया गया था। स्थिति इतनी भयावह थी कि कोई भी सरकारी कर्मी क्षेत्र में पदस्थापन लेने को तैयार नहीं होता था। ग्रामीणों के विरोध से बदला माहौल अलग राज्य बनने के बाद पथ, पुल और पुलियों की स्वीकृति तो मिली, लेकिन उग्रवाद के कारण कार्य बाधित होता रहा। इसके बाद चरकी, जमडार और तराई क्षेत्र के ग्रामीणों ने संगठित होकर उग्रवाद के खिलाफ आवाज बुलंद की। ग्रामीणों के कड़े विरोध और तत्कालीन मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी तथा विधायक रविंद्र कुमार राय के समर्थन से उग्रवादी क्षेत्र छोड़ने को मजबूर हुए। सड़क-पुलों से जुड़ा गावां इसके बाद गावां-पटना, पटना-माल्डा और जोड़ासिमर समेत कई नदियों पर पुलों का निर्माण हुआ। कई महत्वपूर्ण सड़कों के बनने से अधिकांश गांव मुख्य मार्ग से जुड़ गए। सुरक्षा की दृष्टि से पिहरा, बरमसिया, तराई और जमडार में पुलिस पिकेट स्थापित किए गए। अपराधियों और उग्रवादियों के खिलाफ लगातार अभियान चलाया गया, जिससे क्षेत्र में अमन-चैन की स्थापना हुई। सिंचाई, स्वास्थ्य, शिक्षा अब भी चिंता का विषय विकास के बावजूद चिकित्सा और शिक्षा व्यवस्था आज भी संतोषजनक नहीं है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में ताले लटके हैं, जबकि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र एक-दो चिकित्सकों के भरोसे संचालित हो रहे हैं। विद्यालयों में विषयवार शिक्षकों की भारी कमी है, जिससे बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। सिंचाई के साधनों का अपेक्षित विकास नहीं हो सका है। इसके कारण खेती पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है और किसान पूरी तरह मानसून पर निर्भर हैं। बेरोजगारी बनी सबसे बड़ी समस्या क्षेत्र में बेरोजगारी गंभीर समस्या बन चुकी है। बड़ी संख्या में युवा रोजगार की तलाश में महानगरों की ओर पलायन कर रहे हैं। माइका उद्योग कभी क्षेत्र में रोजगार का प्रमुख साधन था, लेकिन अलग राज्य बनने के बाद इसे वैध रूप से पुनः शुरू नहीं किया गया। अवैध उत्खनन के कारण आए दिन अप्रिय घटनाएं घटती रहती है। स्थानीय लोग माइका उद्योग को नियंत्रित और वैध रूप में पुनः शुरू करने की मांग कर रहे हैं। रेल मार्ग का सपना अब भी अधूरा वर्षों से क्षेत्र को रेल मार्ग से जोड़ने की मांग की जा रही है, लेकिन अब तक यह सपना साकार नहीं हो सका है। लोगों का मानना है कि रेल संपर्क स्थापित होने से रोजगार और विकास को नई दिशा मिलेगी। गावां का तब संपूर्ण विकास होता।

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