Gridih News: परिवार और समाज में तनाव और टूटते रिश्तों का प्रमुख कारण अहंकार: मुनि श्री
Gridih News: परिवार और समाज में बढ़ती दूरियों का मुख्य कारण अहंकार है। संवादहीनता और समन्वय के अभाव में यदि व्यक्ति मिलनसारिता और विनम्रता विकसित करे, तो अधिकांश विवाद स्वतः समाप्त हो सकते हैं। मुनि प्रमाण सागर जी महाराज ने इस विषय पर प्रवचन दिया।

Gridih News: पीरटांड़, प्रतिनिधि। परिवार और समाज में बढ़ती दूरियों, तनाव और टूटते रिश्तों का प्रमुख कारण अहंकार है। संवादहीनता और समन्वय का अभाव होता है। यदि व्यक्ति अपने व्यवहार में मिलनसारिता, विनम्रता, सामंजस्य और दूसरों की भावनाओं के प्रति सम्मान का भाव विकसित कर ले, तो अधिकांश विवाद स्वतः समाप्त हो सकते हैं। उक्त बातें राष्ट्रसंत मुनि प्रमाण सागर जी महाराज ने गुणायतन में आयोजित प्रातःकालीन धर्मसभा में प्रवचन के दौरान कही।
समाज में अहंकार की भूमिका
गुणायतन में साधनारत राष्ट्र संत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि संसार में विभिन्न स्वभाव के लोग रहते हैं। कुछ हर वातावरण में सहजता से घुल-मिल जाते हैं, जबकि कुछ अपने विचारों और आग्रहों में इतने बंध जाते हैं कि किसी के साथ सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाते। उन्होंने कहा कि मिलनसार होने का अर्थ अपने सिद्धांतों से समझौता करना नहीं, बल्कि परिस्थिति, समय और व्यक्ति को समझते हुए स्वयं को उसके अनुरूप ढालने की क्षमता विकसित करना है। कहा कि व्यक्ति को यह स्वीकार करने की आदत डालना चाहिए।
विवादों का समाधान
एक दूसरे के विचारों को सुनने, समझने और स्वीकार करने का अभ्यास विकसित हो जाये, तो जीवन में अनेक मतभेद स्वतः समाप्त हो जायेगा। उन्होंने कहा कि अपनी बात रखना उचित है, लेकिन उसे दूसरों पर थोपना उचित नहीं। आज अधिकांश पारिवारिक विवाद इसलिए बढ़ते हैं क्योंकि लोग अपनी बात मनवाने पर अड़े रहते हैं। माता-पिता, पति-पत्नी, भाई-भाई तथा अन्य रिश्तों में अधिकार का प्रदर्शन संवाद और स्नेह को कमजोर कर देता है। यदि प्रत्येक व्यक्ति थोड़ा धैर्य, त्याग और समन्वय अपनाए, तो परिवार में सुख और शांति का वातावरण बन सकता है। कहा कि व्यवहार की शुद्धता के लिए समन्वयात्मक दृष्टि अत्यंत आवश्यक है।
अहंकार का त्याग
जीवन में कोई भी समस्या ऐसी नहीं होती जिसका समाधान न हो। अहंकार ही संबंधों को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाता है। जिस अहंकार से मन की शांति समाप्त हो जाए, संबंध टूट जाएं और जीवन की सहजता नष्ट हो जाए, ऐसे अहंकार का कोई महत्व नहीं है। इसलिए व्यक्ति को अपने अहंकार का पोषण नहीं, बल्कि उसका त्याग करना चाहिए। विनम्रता, सरलता और आत्मीयता ही श्रेष्ठ व्यवहार की पहचान है।
फोटो 10 जीआरडी 62 प्रवचन देते मुनि श्री।
63 अभिषेक करते श्रद्धालु।


