बदलते व्यवहार से बैंककर्मियों व ग्रामीणों में बढ़ रही दूरी
झारखंड के जमुआ प्रखंड में बैंकों का ग्रामीणों के साथ संबंध कमजोर हो रहा है। पहले बैंककर्मी गांवों में रहते थे और सामाजिक आयोजनों में सक्रिय रूप से भाग लेते थे। अब वे शहरों से आते हैं और ग्राहकों के प्रति रुखा व्यवहार करते हैं। ग्रामीणों ने बैंक प्रबंधन से पुराने संबंधों को पुनर्जीवित करने की अपील की है।

झारखंडधाम, प्रतिनिधि। जमुआ प्रखंड क्षेत्र स्थित कई बैंकों का दायरा धीरे-धीरे सिमटता नजर आ रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि बैंक और समाज के बीच जो आत्मीय रिश्ता कभी हुआ करता था, वह अब लगातार कमजोर पड़ता जा रहा है। इसके पीछे बैंककर्मियों का बदलता व्यवहार और गांव-समाज से बढ़ती दूरी को प्रमुख कारण माना जा रहा है। ग्रामीण बताते हैं कि पहले बैंक अधिकारी और कर्मचारी गांवों में ही निवास करते थे। इससे आम लोगों के साथ उनका बेहतर तालमेल बना रहता था। शादी-विवाह, जन्मदिन, श्राद्ध, पूजा-पाठ या किसी सामाजिक आयोजन में बैंककर्मियों को सादर आमंत्रित किया जाता था और वे भी लोगों के सुख-दुख में बढ़-चढ़कर शामिल होते थे।
गांव के विकास, सामाजिक सहयोग और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में उनकी सक्रिय भूमिका रहती थी।लोगों का कहना है कि उस समय बैंक केवल लेन-देन का केंद्र नहीं था, बल्कि समाज का एक अभिन्न हिस्सा माना जाता था। बैंककर्मी ग्राहकों को परिवार की तरह सम्मान देते थे और उपभोक्ताओं की समस्याओं को गंभीरता से सुनते थे। इससे लोगों का बैंक के प्रति भरोसा और लगाव दोनों बना रहता था। लेकिन समय के साथ स्थिति बदलती चली गई। अब अधिकांश बैंककर्मी शहरों से आना-जाना करते हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि कई कर्मचारी ग्राहकों से रुखा व्यवहार करते हैं और उनकी समस्याओं को गंभीरता से नहीं लेते। बैंक परिसर में भी पहले जैसी आत्मीयता नहीं दिखती। ग्रामीणों ने यह भी कहा कि स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, हिंदी पखवाड़ा, विदाई समारोह अथवा अन्य सामाजिक कार्यक्रमों में अब उपभोक्ताओं और क्षेत्र के प्रतिष्ठित लोगों को आमंत्रित नहीं किया जाता। इससे लोगों को उपेक्षा का एहसास होने लगा है। मंगलवार को रेम्बा स्थित एक व्यावसायिक बैंक से प्रबंधक सहित दो बैंक कर्मियों की विदाई समारोह गुपचुप तरीके से मनाई गई। स्थानीय उपभोक्ताओं और जन प्रतिनिधियों तक को इसकी भनक नहीं लग सकी। स्थानीय लोगों का मानना है कि बैंक और समाज के बीच संवाद कम होने से आमजन धीरे-धीरे बैंकों से कटते जा रहे हैं। कई लोगों ने बैंक प्रबंधन से अपील की है कि पुराने संबंधों और सामाजिक सहभागिता की परंपरा को फिर से जीवित किया जाए, ताकि बैंक और ग्रामीणों के बीच विश्वास एवं आत्मीयता कायम रह सके।
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