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छठ पर बगोदर में बने सूप और दउरा की बिहार तक सप्लाई

छठ पर बगोदर में बने सूप और दउरा की बिहार तक सप्लाई

संक्षेप:

बगोदर में बने सूप और दउरा बिहार में छठ पर्व के लिए महत्वपूर्ण हैं। अटका पूर्वी पंचायत के दलित परिवार बांस से इन सामग्रियों का निर्माण करते हैं। डिमांड बढ़ने पर वे अधिक मात्रा में सामान बनाते हैं।...

Oct 25, 2025 09:02 am ISTNewswrap हिन्दुस्तान, गिरडीह
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बगोदर, प्रतिनिधि। बगोदर में बने सूप और दउरा से बिहार के कई हिस्सों में छठ मनता है। अटका पूर्वी पंचायत के बूढ़ाचांच दलित परिवार के द्वारा बनाए जाने वाले सूप- दउरा, कड़हुल आदि की सप्लाई बिहार में की जाती है। महापर्व छठ को लेकर बांस से अन्य दिनों की अपेक्षा सामग्रियां अधिक बनाई जाती है। चूंकि डिमांड बढ़ जाती है। बगोदर प्रखंड के अटका पूर्वी पंचायत के बिरहोर टंडा, जरमुन्ने पश्चिमी पंचायत के पाकीटांड़ एवं बूढ़ाचांच के दलित परिवारों के द्वारा बांस से सामग्रियां बनाई जाती है। बांस से सामग्रियां बनाने का कुटीर उद्योग यूं तो यहां सालों भर संचालित होता है मगर लोक आस्था के महापर्व छठ के मौके पर एक पखवाड़े तक ज्यादा संख्या में बांस से सूप, दउरा, कड़हुल आदि बनाए जाते हैं।

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शांति देवी बताती हैं कि बांस से सामान बनाकर वे सभी अपने घरों में रखते हैं। बिहार से खरीदार पहुंचते हैं और वे खरीदारी कर बिहार ले जाते हैं। बताती हैं कि यहां के तुरी परिवारों का जीविकोपार्जन का मुख्य पेशा बांस से सामान बनाना और फिर उसे बेचना है। बताया जाता है कि बूढ़ाचांच के दलित परिवारों के द्वारा बांस से सामग्रियां बनाने के लिए पड़ोसी प्रखंड बिष्णुगढ़ के गांवों से बांस की खरीदारी करते हैं और फिर उससे सामग्रियां बनाकर उसकी बिक्री की जाती है। बताते हैं कि बांस से सामग्रियां बनाना उनकी परंपरागत पेशा है और उस पेशा को आज भी जिंदा रखा गया है। हालांकि बांस का दाम बढ़ जाने से महंगे दामों में सूप, दउरा, कड़हुल, पंखा आदि बेचने की लाचारी है। बताते हैं कि बांस से सामान बनाने में परेशानी जरूर होती है लेकिन उसे बेचने में किसी तरह की कोई परेशानी नहीं होती है। बिहार से एक खरीदार हमेशा आता है और फिर घर- घर से सामान लेकर और दाम देकर चला जाता है। बताती हैं कि लोक आस्था के महापर्व पर डिमांड बढ़ जाता है। इस परिवार का यह भी कहना है कि इस परंपरागत धंधे को जीवित रखने में सरकारी स्तर पर किसी तरह का कोई सहयोग नहीं मिलता है। सरकारी स्तर पर सहयोग मिलने से धंधा भी बढ़ता और आर्थिक स्थिति भी मजबूत होती। बांस के कारीगरों के द्वारा सरकारी सहायता की मांग की गई है। बांस से सामग्रियां बनाने में महिलाएं ज्यादा इंटरेस्ट लेती हैं।