मनरेगा में मैटेरियल के नाम पर चार करोड़ की चपत
जमुआ प्रखंड में मनरेगा के मैटेरियल मद में चार करोड़ रुपये के बंदरबांट का मामला सामने आया है। आरोप है कि बिना सामग्री आपूर्ति के कागजी वाउचर के सहारे सरकारी राशि निकाली गई। कई लाभुक अब भी भुगतान से वंचित हैं। प्रमुख मिष्टू देवी ने उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।

जमुआ, प्रतिनिधि। जमुआ प्रखंड में मनरेगा के मैटेरियल मद में करीब चार करोड़ रुपये के कथित बंदरबांट का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। आरोप है कि बिना वास्तविक सामग्री आपूर्ति के सिर्फ कागजी वाउचर के सहारे सरकारी राशि की निकासी कर ली गई। ग्रामीणों के बीच चर्चा है कि माल सरकार का और मौज कुछ लोगों की योजना की मंशा को खुली चुनौती दी जा रही है। सूत्रों के मुताबिक, प्रखंड में सक्रिय करीब आठ वेंडरों में से अधिकांश के पास न तो पंजीकृत निर्माण सामग्री की दुकान है और न ही खनन से जुड़ा वैध पट्टा। इसके बावजूद सीमेंट, छड़, गिट्टी, मोरम और बालू की आपूर्ति के नाम पर बिल समायोजित किए जा रहे हैं।
बालू को लेकर पूरे झारखंड में टेंडर प्रक्रिया स्पष्ट नहीं होने के बावजूद भुगतान होना गंभीर सवाल खड़े करता है। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि पशु शेड निर्माण मद में राशि निकासी के छह माह बाद भी कई लाभुक भुगतान से वंचित बताए जा रहे हैं। इससे साफ संकेत मिलता है कि कागजों पर विकास और जमीन पर सन्नाटा है। प्रमुख मिष्टू देवी ने इसे संगीन वित्तीय अनियमितता बताते हुए उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। प्रमुख प्रतिनिधि संजीत यादव और उप प्रमुख रब्बुल हसन रब्बानी ने भी ऐलान किया है कि वे उपायुक्त से मिलकर साक्ष्य सहित विस्तृत शिकायत सौंपेंगे। उनका आरोप है कि तकनीकी पदाधिकारियों एई और जेई की मिलीभगत से गड़बड़ियां हुईं और अब भी हर दिन हर योजना से रुपए लेकर बिल बनाता है और वाउचर पास करने में रुपए की उगाही करता है। विभिन्न पंचायतों के पंसस भी मुखर है कि जांच कर रोजगार सेवक, पंचायत सचिव और जेई व एई पर करवाई हो। सवाल यह है कि यदि सब कुछ पारदर्शी है तो फिर जमीनी स्तर पर लाभुक क्यों भटक रहे हैं? क्या प्रशासन सख्त कार्रवाई करेगा या मामला कागजी सफाई में दब जाएगा? अब निगाहें जिला प्रशासन की पहल पर टिकी हैं।
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