प्रकृति के प्रति आस्था का बाहा पर्व में हरसोलास के संपन्न

Feb 27, 2026 01:30 am ISTNewswrap हिन्दुस्तान, गोड्डा
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बोआरीजोर में संथाली आदिवासियों द्वारा बाहा पर्व धूमधाम से मनाया गया। यह पर्व तीन दिनों तक चलता है, जिसमें पहले दिन पूजा स्थल की तैयारी, दूसरे दिन नायकी का नाच-गान और तीसरे दिन सादा पानी का खेल होता है। संताल समाज की मान्यता है कि बाहा केवल सादा पानी से खेला जाना चाहिए।

प्रकृति के प्रति आस्था का बाहा पर्व में हरसोलास के संपन्न

बोआरीजोर प्रतिनिधि। बोआरीजोर में बोआरीजोर संथाली में आदिवासियों की ओर से गुरुवार को प्रमुख प्रकृति पर्व बाहा अत्यंत धूमधाम और हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। पर्व को लेकर समाजसेवी सच्चिदानंद सोरेन ने बताया कि बाहा पर्व तीन दिनों तक मनाया जाता है। प्रथम दिन - जाहेर दाप माह इस दिन पूजा स्थल जाहेर थान में छावनी बनाई जाती है और स्थल की तैयारी की जाती है। द्वितीय दिन बोंगा माह इस दिन ग्रामीण गांव के नायकी (पुजारी) को उनके आंगन से नाच-गान के साथ जाहेर थान तक ले जाते हैं। वहां पहुंचने पर नायकी बोंगा दारी (पूज्य पेड़) सारजोम पेड़ (सखवा पेड़) के नीचे पूजा स्थलों का गोबर और पानी से शुद्धिकरण करते हैं,जिसे गेह-गुरिह कहा जाता है।

इसके बाद सिंदूर, काजल आदि अर्पित कर मातकोम (महुआ) और सखवा के फूल चढ़ाए जाते हैं। बाहा पर्व में जाहेर ऐरा, मारांग बुरु, मोड़ेकू-तुरुयकू, धोरोम गोसाई आदि इष्ट देवी-देवताओं के नाम पर बलि दी जाती है। नायकी सहित महिला-पुरुष, बुजुर्ग एवं बच्चों को सखवा का फूल प्रदान करते हैं। फूल ग्रहण करने के पश्चात ग्रामीण नायकी को प्रणाम करते हैं। पुरुष भक्त इसे कान में तथा महिला भक्त बालों के खोपा में लगाती हैं। इसके बाद तुन्दाह और टमाक की थाप पर बाहा नृत्य एवं गीत प्रस्तुत किए जाते हैं। नृत्य के उपरांत सभी प्रसाद ग्रहण करते हैं। तत्पश्चात ग्रामीण नायकी को पुनः नाच-गान के साथ गांव वापस लाते हैं। गांव पहुंचकर नायकी प्रत्येक घर में सखवा का फूल देते हैं। घर के सदस्य नायकी के सम्मान में उनके चरण धोते हैं। फूल प्राप्त होते ही लोग एक-दूसरे पर सादा पानी डालते हैं। तृतीय एवं अंतिम दिन शरदी माह इस दिन सुबह से ही ग्रामीण एक-दूसरे पर सादा पानी डालकर बाहा पर्व का आनंद लेते हैं। संताल आदिवासी समाज की मान्यता है कि बाहा केवल सादा पानी से ही खेला जाना चाहिए रंग पानी से खेलना परंपरा के विरुद्ध माना जाता है। ग्रामीणों ने बताया कि पूर्वजों से चली आ रही परंपरा के अनुसार संताल समाज हमेशा सादा पानी से ही बाहा खेलता आया है। समाज में रंगों का अपना विशिष्ट महत्व है, इसी कारण बाहा में रंग पानी का प्रयोग नहीं किया जाता। पूर्व समय में यदि किसी कुंवारी लड़की पर रंग पानी डाल दिया जाता था तो उसे छुत/अशुद्ध माना जाता है। अंत में सभी ग्रामीण एक-दूसरे के घर जाकर सामूहिक भोजन करते हैं। इस मौके पर रघु हेंब्रम, मारंग मोय टुडू, सहित दर्जनों महिलाएं पुरुष उपस्थित थी।

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