गुमला में शकुंतला ने तोड़ा कांग्रेस-जेएमएम का किला
एक दशक बाद नगर परिषद की सत्ता भाजपा समर्थित प्रत्याशी के हाथ, कार्यकर्ताओं में नई जान एक दशक बाद नगर परिषद की सत्ता भाजपा समर्थित प्रत्याशी के हाथ, का

गुमला नगर परिषद चुनाव का परिणाम केवल एक अध्यक्ष पद की जीत नहीं, बल्कि स्थानीय राजनीति में बड़ा संदेश है। भाजपा समर्थित प्रत्याशी शकुंतला उरांव ने कांग्रेस-जेएमएम गठबंधन से नगर परिषद अध्यक्ष की कुर्सी छीनकर भाजपा को लंबे समय बाद बड़ी राहत दी है। लोकसभा और विधानसभा चुनावों में मिली हार से जूझ रही भाजपा के लिए यह जीत किसी राजनीतिक संजीवनी से कम नहीं मानी जा रही। 23 फरवरी को हुए चुनाव में कुल 23,531 मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। इसमें शकुंतला उरांव ने 32.29 प्रतिशत वोट हासिल कर सबसे आगे रहते हुए जीत दर्ज की। खास बात यह रही कि भाजपा के ही दो बागी प्रत्याशी ब्रिजिट कांति टोप्पो और रामेश्वरी उरांव ने क्रमशः 7.01 और 3.47 प्रतिशत मत प्राप्त कर भाजपा समर्थित प्रत्याशी की राह मुश्किल बनाने की कोशिश की।
इसके बावजूद शकुंतला का शीर्ष पर रहना यह दिखाता है कि शहरी मतदाताओं में भाजपा के प्रति भरोसा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। वहीं दूसरी ओर जेएमएम समर्थित प्रत्याशी हर्षिता टोप्पो को 18.83 प्रतिशत और कांग्रेस समर्थित सीता देवी को 11.80 प्रतिशत मतों पर संतोष करना पड़ा। यह आंकड़े साफ संकेत देते हैं कि नगर परिषद चुनाव में कांग्रेस और जेएमएम के पारंपरिक मुस्लिम और ईसाई वोट बैंक में बंटवारा हुआ। यही बिखराव भाजपा समर्थित प्रत्याशी के लिए निर्णायक साबित हुआ और कांग्रेस-जेएमएम की रणनीति को कमजोर कर गया। चुनाव में प्रो. शिमला कुमारी ने 7.02 प्रतिशत मत हासिल कर शहरी क्षेत्र में सरना समाज के वोटरों के बीच अपनी मजबूत मौजूदगी का संकेत दिया। इससे यह भी स्पष्ट हुआ कि गुमला की शहरी राजनीति अब केवल दो दलों के इर्द-गिर्द सीमित नहीं रह गई है,बल्कि मतदाता नए विकल्पों को भी गंभीरता से देख रहे हैं। इस पूरे चुनावी घटनाक्रम में गुमला विधानसभा क्षेत्र के जेएमएम विधायक भूषण तिर्की को सबसे बड़ा सियासी झटका लगा। उन्होंने वार्ड संख्या तीन से अपने छोटे भाई जेम्स तिर्की को भावी उपाध्यक्ष पद के उम्मीदवार के रूप में उतारा था, लेकिन उन्हें प्रवीण टोप्पो के हाथों करारी शिकस्त झेलनी पड़ी। यह हार केवल एक वार्ड की पराजय नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर जेएमएम की पकड़ कमजोर होने का संकेत भी मानी जा रही है। शकुंतला उरांव की जीत ने जहां भाजपा खेमे में उत्साह भर दिया है, वहीं कांग्रेस और जेएमएम के लिए यह नतीजा आत्ममंथन और रणनीति बदलाव की चेतावनी बनकर सामने आया है। ................ गुमला नगर परिषद चुनाव में चली बदलाव की लहर गुमला के 22 वार्डों में से 17 में नए पार्षदों को मिला मौका गुमला संवाददाता नगर परिषद के 22 वार्डों के लिए हुए चुनाव ने शहरी राजनीति का स्पष्ट संकेत दे दिया है ,मतदाता इस बार बदलाव चाहते थे, लेकिन अनुभव को पूरी तरह नकारने के मूड में भी नहीं थे। परिणामस्वरूप 22 पार्षदों में 17 नए चेहरे चुने गए हैं,जबकि पांच पुराने पार्षदों पर जनता ने फिर से भरोसा जताया है। यह संयोजन बताता है कि मतदाता संतुलन की राजनीति को प्राथमिकता दे रहे हैं। कुल 22 वार्डों में 11 पुरुष और 11 महिला प्रत्याशी निर्वाचित हुए हैं। यह आंकड़ा यह दर्शाता है कि शहरी निकाय चुनावों में महिला भागीदारी अब प्रतीकात्मक नहीं,बल्कि निर्णायक भूमिका में है।अनुभव के आधार पर दो पार्षदों ने नया कीर्तिमान बनाया। वार्ड दो से केके मिश्रा और वार्ड 17 से हेमलता देवी ने लगातार चौथी बार जीत दर्ज की। वहीं वार्ड 21 से शैल मिश्रा ने लगातार तीसरी बार जीत हासिल कर अपनी राजनीतिक पकड़ बनाए रखी। इन परिणामों को मतदाताओं द्वारा कार्य-आधारित मूल्यांकन के रूप में देखा जा रहा है, जहां निरंतरता को विकास और संवाद से जोड़ा गया।वार्ड संख्या तीन का चुनाव परिणाम विशेष चर्चा में रहा। गुमला विधानसभा क्षेत्र के विधायक भूषण तिर्की के छोटे भाई जेम्स तिर्की का मुकाबला पूर्व पार्षद स्व. शीला टोप्पो के पुत्र प्रवीण टोप्पो से हुआ। मतों की गणना में प्रवीण टोप्पो को 471 और जेम्स तिर्की को 175 मत मिले। 296 मतों के बड़े अंतर से हुई इस हार को स्थानीय स्तर पर वंशवादी प्रभाव की सीमाओं और व्यक्तिगत पहचान के महत्व के रूप में देखा जा रहा है।इस चुनाव में युवाओं की भागीदारी और सफलता भी महत्वपूर्ण संकेत देती है। वार्ड नौ में निवर्तमान पार्षद आरिफ आलम और समाजसेविका सैयदा खातून के मुकाबले युवा प्रत्याशी मो. जिशान की जीत को नई पीढ़ी के प्रति मतदाताओं के भरोसे के रूप में देखा जा रहा है। इसी प्रकार वार्ड दस से मोहम्मद फैजान की जीत भी युवा नेतृत्व के उभरने का उदाहरण बनी है।
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