Ghatsila News: जंगलों में दुर्लभ होते जा रहा है दीमकों के टीला से निकलने वाला मशरूम
Ghatsila News: चाकुलिया प्रखंड के जंगलों में बरसात के मौसम में मिलने वाला टीला मशरूम अब दुर्लभ होता जा रहा है। इसे ग्रामीण स्वादिष्ट मानते हैं, पर यह मुश्किल से मिलता है। इसकी कीमत 500 से 800 रुपए प्रति किलो है और यह आम तौर पर जुलाई से सितंबर में दीमकों के टीलों पर पाया जाता है।

Ghatsila News: चाकुलिया। चाकुलिया प्रखंड के जंगलों में बरसात के मौसम में दीमकों के टीला में पाया जाने वाला प्राकृतिक और जंगली टीला मशरूम अब धीरे- धीरे दुर्लभ होते जा रहा है। यह मशरूम प्रोटीन विटामिन और खनिजों का खजाना होता है। ग्रामीण इसे बड़े चाव से खाते हैं। ग्रामीण इसे टीला मशरूम और खुखड़ी कहते हैं। वहीं संथाली भाषा में इसे बुनुम (टीला) उत (मशरूम) कहा जाता है। ग्रामीणों के मुताबिक यह मशरूम स्वादिष्ट होता है और बाजारों में यदा कदा ही मिलता है। इसकी कीमत स्थानीय बाजारों में 500 से 800 रुपए प्रति किलो होती है। आमतौर पर यह मशरूम साल के जंगलों में पेड़ के नीचे दीमकों के टीलों पर बरसात के मौसम में जुलाई से सितंबर तक निकलता है।
सफेद रंग का यह मशरूम बहुत छोटा होता है। इन दिनों यह मशरूम प्रखंड के बड़ामारा गांव के आसपास साल के जंगलों में कहीं- कहीं पर दीमकों के टीलों पर पाया जा रहा है। ग्रामीण इस मशरूम को लाने के लिए जंगलों में जाते हैं। इस साल जंगलों में दीमकों के टीले हैं। बड़ामारा गांव के देवनारायण हांसदा ने कहा कि साल जंगलों में दीमकों टीलों पर टीला मशरूम निकालना शुरू हो गया है। परंतु अल्प वर्षा के कारण यह दीमकों के टीलों पर यह मशरूम कम निकल रहा है। उन्होंने कहा कि यह मशरूम अन्य मशरूमों से अधिक स्वादिष्ट होता है। परंतु काफी कम मात्रा में मिलता है। कालियाम पंचायत के मुखिया दासो हेंब्रम ने कहा कि इस इलाके के साल जंगलों में भी टीला मशरूम पाया जाता है। उन्होंने कहा कि इस मशरूम का स्वाद मटन जैसा होता है। ग्रामीण जंगल से इस मशरूम को लाकर बड़े चाव से खाते हैं।
लेखक के बारे में
Hindustanलेटेस्ट Hindi News , बॉलीवुड न्यूज, बिजनेस न्यूज, टेक , ऑटो, करियर , और राशिफल, पढ़ने के लिए Live Hindustan App डाउनलोड करें।


