प्रथमा अष्टमी पर जेष्ठ संतान की दीर्घायु की कामना

प्रथमा अष्टमी पर जेष्ठ संतान की दीर्घायु की कामना

संक्षेप:

बहरागोड़ा प्रखंड क्षेत्र के सभी गांव में प्रथमा अष्टमी का त्योहार धूमधाम से मनाया गया। यह त्योहार परिवार के सबसे बड़े बच्चे के उत्तम स्वास्थ्य और लंबी आयु के लिए प्रार्थना करने का दिन है। इस दिन मुर्गा लड़ाई का भी रिवाज है, जो आदिवासी समाज में पीढ़ियों से चला आ रहा है।

Nov 13, 2025 02:21 am ISTNewswrap हिन्दुस्तान, घाटशिला
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बहरागोड़ा,संवाददाता। बहरागोड़ा प्रखंड क्षेत्र के सभी गांव में प्रथमा अष्टमी का त्योहार धूमधाम से मनाया गया। जानकारी के अनुसार, प्रथमा अष्टमी ओडिशा का एक महत्वपूर्ण त्योहार है, जो हर साल मनाया जाता है। यह त्योहार परिवार के सबसे बड़े बच्चे (जेष्ठ संतान) के उत्तम स्वास्थ्य, लंबी आयु और समृद्धि के लिए प्रार्थना करने के लिए समर्पित है। यह उड़िया कैलेंडर के अनुसार, मार्गसिर महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को पड़ता है। यह परिवार के प्रथम जन्मी संतान चाहे पुत्र हो या पुत्री जिन्हें प्यार से 'पोढुआ' भी कहा जाता है, जिसको सम्मानित करने का दिन है। इसका महत्व सबसे बड़ी संतान को परिवार की परंपराओं को आगे बढ़ाने वाला और भविष्य में परिवार का स्तंभ माना जाता है।

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इस दिन माताएं और बड़े, बच्चों की संरक्षक देवी षष्ठी देवी की पूजा करते हैं। सबसे बड़े बच्चे को नए कपड़े पहनाए जाते हैं। मामा इस दिन विशेष रूप से महत्वपूर्ण होते हैं जो बच्चे के लिए नए कपड़े और उपहार भेजते हैं। मां या परिवार की कोई अन्य बुजुर्ग महिला बच्चे की आरती करती है। इस दिन विशेष रूप से 'एण्डूरी पीठा' नामक पारंपरिक पीठा बनाई जाती है। इसे काल भैरव अष्टमी, सौभाग्यिनी अष्टमी और पापनाशिनी अष्टमी के नाम से भी जाना जाता है। गांवों में मुर्गा लड़ाई का भी रिवाज बहरागोड़ा प्रखंड क्षेत्र के कई सारे गांव में हर साल की भांति इस साल भी प्रथमा अष्टमी के दिन मुर्गा लड़ाई का भी रिवाज रखा गया था। जिसमें बहरागोड़ा, जगन्नाथपुर, दारिशोल, मानुषमुड़िया, बेनाशोली,कुमारडूबि, धानघोरी गांव में मुर्गा पाड़ा मेला का भी आयोजन किया गया था। मुर्गा लड़ाई की परंपरा पीढ़ियों से है और यह एक मनोरंजन का हिस्सा है। आदिवासी-मूलवासी समाज में मुर्गा लड़ाई कई पीढ़ियों से मनोरंजन का हिस्सा बना हुआ है। इस लड़ाई को संस्कृति से जोड़कर रखने को भी देखा जाता है।