पर्यावरण संरक्षण को होलिका दहन के लिए गौशाला में बन रहे गोबर के उपले
वर्ष 2026 में होली 4 मार्च को मनाई जाएगी। चाकुलिया के कोलकाता पिंजरापोल सोसायटी गौशाला ने पर्यावरण जागरूकता के लिए उपले (कंडों) का उपयोग किया है। इनकी मांग बढ़ रही है और बड़े शहरों से ऑर्डर मिल रहे हैं। 10 मजदूर गोबर से उपले बनाने में जुटे हैं।

चाकुलिया,संवाददाता। वर्ष 2026 में होलिका दहन 3 मार्च को और होली 4 मार्च को मनाई जाएगी। लेकिन, इस बार चाकुलिया नया बाजार स्थित कोलकाता पिंजरापोल सोसायटी गौशाला न केवल प्राचीन परंपराओं का संरक्षण कर रही है, बल्कि समाज को पर्यावरण के प्रति जागरूक करने का एक बड़ा संदेश भी दे रही है। यहां होलिका दहन के लिए लकड़ी के बदले उपले (कंडों)बनाए जा रहे हैं, जिसकी मांग भी बढ़ी है। गौशाला के प्रबंधक वीरेंद्र गिरि ने बताया कि इस वर्ष इन उपलों की भारी मांग है। अब तक कोलकाता और विशाखापत्तनम जैसे बड़े शहरों से भारी मात्रा में ऑर्डर प्राप्त हो चुके हैं।
मांग को पूरा करने के लिए पैकिंग का कार्य युद्धस्तर पर चल रहा है। गौशाला द्वारा तैयार किए गए एक पैकेट का मूल्य 300 रुपये रखा गया है। इस पैकेट में होलिका दहन के लिए आवश्यक सभी पारंपरिक सामग्रियां शामिल हैं। 10 मजदूर दिनरात बनाने में जुटे गौशाला कर्मी सागर धल की देखरेख में लगभग 10 मजदूर दिन-रात देसी गाय के गोबर से उपले और अन्य पारंपरिक आकृतियां बनाने में जुटे हैं। मालूम हो कि भारतीय संस्कृति में गौ माता को सर्वश्रेष्ठ और अत्यंत पवित्र माना गया है। आयुर्वेद में गाय से प्राप्त पंचगव्य—दूध, दही, घी, गोमूत्र और गोबर—का विशेष महत्व है। गौशाला कर्मी सागर धल की देखरेख में लगभग 10 मजदूर दिन-रात देसी गाय के गोबर से उपले और पारंपरिक आकृतियां बनाने में जुटे हैं। आयुर्वेद के अनुसार, गोबर के जलने से निकलने वाला धुआं वातावरण के हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट कर पर्यावरण को शुद्ध बनाता है। क्या-क्या है पैकेट में होला, होलिका, ढाल और खड़ाऊं। नारियल, पान पत्ता और सुपारी। चांद-सूरज, तारा, चकला-बेलन, तावा-कड़ाही। बड़कुल्ला, हल्दी और धागा।

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