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अस्तित्व बचाने के लिए संघर्षरत है घाटशिला का प्रसिद्ध बिन्धा मेला

कभी शंखों की चुड़ियों, शंख एवं कांसे की बर्तन के लिए प्रसिद्ध बिन्धा मेला आज अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है। राजाओं के जमाने से घाटशिला थाना के समीप लगने वाला मेला में एक महीने तक सुबह से शाम तक खरीददारों की इतनी भीड़ लगी रहती थी कि मेला में तील भर पांव रखने की जगह नहीं रहती थी। लेकिन पिछले 10 सालों में इस मेला से लोगों ने ऐसा मुंह मोड़ा की दिन भर में एक-दो खरीददार भी नहीं आते। बावजूद परंपरा का निर्वाह करने के लिए बंगाल के मुर्शीदाबाद, खड़गपुर, झाड़ग्राम के आधा दर्जन से अधिक दुकानदार कांसा के बर्तन, शंख की चुड़िया, शंख समेत अन्य समान लेकर हर साल मेले में पहुंचते हैं। इस संबंध में दुकानदार अशोक दिगार ने कहा कि इस मेला का शुभारंभ राजा जगदीश चन्द्र धवलदेव ने शुरू किया था। उस समय घाटशिला में एक-दो दुकान ही हुआ करता था। कांसे की बर्तन, शंख की चुड़ियां समेत अन्य महिलाओं के जरूरतों की समान नहीं मिल पाते थे। खासकर महिलाएं साल भर इस मेला के लगने का इंजतार करती थी। मेला लगते ही समानों की बिक्री शुरू हो जाती थी। देखते ही देखते सभी समान भी बिक जाते थे। लेकिन अब दुकानों की घाटशिला में भरमार हो गई है। आजकल कांसे की जगह स्टील के बर्तन ने ले लिए हैं। शंख की चुड़ियों की जगह कांच की चुड़ियों ने ले लिया है। इस कारण इस मेला से लोगों का आकर्षण कम होता जा रहा है। लेकिन हमलोग जबतक हैं, मेला में सामान बिके या न बिके हर साल जरूर दुकान लगायेंगे।

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  • Web Title: Famous Bindha Mela is struggling to save survival