सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा महायज्ञ का आयोजन

हिन्दुस्तान, दुमका
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सरैयाहाट में पुरुषोत्तम मास के अवसर पर सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा महायज्ञ का आयोजन किया गया। कथा वाचक बाल ब्यास चंदन शरण ने सच्ची खुशी और मन की शांति पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि कृष्ण केवल इतिहास नहीं, बल्कि हमारे जीवन के सारथी हैं। कार्यक्रम में ग्रामीणों और युवाओं का सक्रिय सहयोग रहा।

सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा महायज्ञ का आयोजन

सरैयाहाट, प्रतिनिधि। सरैयाहाट-जमुआ ब्राह्मण टोला में पुरुषोत्तम मास के अवसर पर सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा महायज्ञ का आयोजन किया गया है। जिसके सातवें दिन कथा वाचक बाल ब्यास चंदन शरण ने कहा कि भागवत कथा मन के मैल को दूर कर सत्यमार्ग पर चलने का प्रेरणा देता है। कथा श्रवण के लिए वहीं यहां पहुंचते हैं जिसपर ईश्वर की कृपा होती है।‌ कहा कि सच्ची खुशी केवल खुद के लिए जीने में नहीं, बल्कि दूसरों के काम आने में है। जब हम नि:स्वार्थ भाव से किसी की मदद करते हैं, तो हमारे मन से नकारात्मकता दूर होती है और करुणा का जन्म होता है। कहा कि आज के युग में मनुष्य की इच्छाएं अनंत हो गई हैं। हम उन चीजों के पीछे भाग रहे हैं जो केवल क्षणिक सुख देती हैं। इस अंधी दौड़ ने हमारे जीवन में तनाव और अशांति को जन्म दिया है। कहा कि शांति बाजार में बिकने वाली वस्तु नहीं, बल्कि भीतर से उपजा हुआ भाव है।

सत्यमार्ग पर चलने की प्रेरणा

सत्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हुए उन्होंने कहा कि मार्ग कठिन हो सकता है, लेकिन सत्य का मार्ग ही गंतव्य तक ले जाता है। कहा कि सत्मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति को शुरू में बाधाएं आ सकती हैं, लेकिन अंत में विजय और मानसिक शांति उसी की होती है। उन्होंने युवाओं से विशेष आग्रह किया कि वे अपनी संस्कृति और संस्कारों को न छोड़ें। कथा का सार बताते हुए एक संदेश दिया कि कृष्ण केवल इतिहास नहीं, बल्कि हमारे जीवन के सारथी हैं। यदि हम अपने जीवन की डोर उन्हें सौंप दें, तो संसार रूपी महाभारत को जीतना सरल हो जाएगा।

कथा का वर्णन

कथा में कृष्ण बाल लीला, कंस वध के साथ ही रुक्मिणी-कृष्ण विवाह का विस्तार से वर्णन किया।‌ कथा का वर्णन करते हुए कहा कि रुक्मिणी विदर्भ के राजा भीष्मक की अत्यंत सुंदरी और विद्वान पुत्री थीं, जिन्हें देवी लक्ष्मी का अवतार माना जाता है। उन्होंने मन ही मन श्रीकृष्ण को अपना पति मान लिया था। रुक्मिणी के बड़े भाई रुक्मी, श्रीकृष्ण से शत्रुता रखते थे और अपनी बहन का विवाह शिशुपाल से कराना चाहते थे। जब इसकी जानकारी रूक्मिणी को हुई तो वह एक ब्राह्मण के माध्यम से श्रीकृष्ण को पत्र भेजकर अपनी व्यथा बताई और उनसे अपना हरण कर विवाह करने का आग्रह किया। उन्होंने पत्र में लिखा कि वे प्रतिदिन पार्वती पूजा के लिए मंदिर जाती हैं और श्रीकृष्ण आकर उन्हें ले जाएं। जब रुक्मिणी पूजा के लिए मंदिर गई, तो श्रीकृष्ण ने उनका हरण कर लिया। तभी रुक्मिणी के पिता ने विधिपूर्वक दोनों का शादी संपन्न कराया। विवाह उत्सव की झाकियां दिखाई गई। कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेवाय के गीतों से श्रद्धालु आनंदित हो उठे। यजमान के रूप में उमाकांत चौधरी व उसकी पत्नी अनिता देवी है। कार्यक्रम को सफल बनाने में समिति के सदस्य व जमुआ गांव के ग्रामीण व नवयुवक काफी सहयोग कर रहे थे।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्रीमद्भागवत कथा महायज्ञ कब आयोजित किया गया?
श्रीमद्भागवत कथा महायज्ञ पुरुषोत्तम मास के अवसर पर आयोजित किया गया।
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