भागवत कथा में शुकदेव महाराज की जन्म वित्तांत, मां के गर्भ में रहे बारह वर्ष
By Newswrap
हिन्दुस्तान, दुमकामसलिया के नागरापथर गांव में सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया गया। दूसरे दिन कथा वाचिका भारती किशोरी जी ने कथा का शुभारंभ किया। उन्होंने बताया कि कैसे महर्षि वेदव्यास जी ने भागवत महापुराण की रचना की। राजा परीक्षित की कथा सुनाते हुए उन्होंने बताया कि मृत्यु से पूर्व प्रभु की कृपा का महत्व क्या है।
मसलिया, प्रतिनिधि। मसलिया के नागरापथर गांव में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन शनिवार को वृंदावन से पधारे कथा वाचिका भारती किशोरी जी ने राधा कृष्ण के आरती के पश्चाद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस का शुभारंभ किया। बताया कि कैसे संसार को 'श्रीमद्भागवत महापुराण' प्राप्त हुआ और कैसे एक राजा के श्राप ने लोक कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया। कथा वाचिक भारती किशोरी ने बताया कि चारों वेदों, महाभारत और पुराणों की रचना के बाद भी महर्षि वेदव्यास जी का मन अशांत था। इसको लेकर वे सरस्वती नदी के तट पर चिंतामग्न थे। तभी देवर्षि नारद का आगमन हुआ,नारद मुनि ने महामुनि व्यास को समझाया कि उन्होंने अब तक केवल धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की चर्चा की है, लेकिन भगवान की अनन्य भक्ति और उनकी लीलाओं का वर्णन नहीं किया। नारदजी की प्रेरणा से व्यास जी ने समाधिस्थ होकर श्रीमद्भागवत महापुराण की रचना की, जो केवल प्रभु की प्रेमाभक्ति पर केंद्रित है। व्यास मुनि ने यह विद्या अपने पुत्र शुकदेव महाराज जी को सिखानी चाही। शुकदेव जी के जन्म की कथा सुनाते हुए बताया कि शुकदेव जी साक्षात् वैराग्य के अवतार हैं। वे अपने मां के गर्भ में बारह वर्ष तक रहे।जन्म लेते ही जंगल की ओर चल दिए थे।वे भगवान विष्णु की आशीर्वाद से मोह माया से मुक्त थे और उनमें स्त्री-पुरुष या ऊंच-नीच का कोई भेद नहीं था। ऐसे निर्विकार परमहंस को व्यास जी ने भागवत के श्लोकों द्वारा आकर्षित कर इस ग्रंथ का अध्ययन कराया। आगे कथा का सबसे मर्मस्पर्शी प्रसंग राजा परीक्षित का रहा।राजा परीक्षित ने प्यास से व्याकुल होकर ध्यानमग्न शमीक ऋषि के गले में मृत सर्प डाल दिया।ऋषि पुत्र श्रृंगी ने जब यह देखा, तो उन्होंने आवेश में आकर राजा को श्राप दिया कि आज से सातवें दिन तक्षक नाग के डसने से तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी। राजा परीक्षित ने जब यह जाना, तो उन्होंने इसे प्रभु की कृपा माना। उन्होंने राज-पाट का त्याग किया और संकल्प के साथ गंगा के तट पर आ गए। जब राजा परीक्षित गंगा तट पर अपनी मुक्ति का मार्ग खोज रहे थे, तब वहां अनेक ऋषि-मुनि पधारे। परंतु अंत में 16 वर्षीय श्री शुकदेव महाराज जी का आगमन हुआ।शुकदेव महाराज जी को देखकर सभी ऋषि उठ खड़े हुए। राजा परीक्षित ने उनसे प्रश्न किया कि जिसकी मृत्यु निकट हो, उसे क्या करना चाहिए? इसी प्रश्न के उत्तर में शुकदेव जी ने परीक्षित को सात दिन तक श्रीमद्भागवत की अमृत वाणी कथा सुनाना प्रारंभ किया। मृत्यु सत्य है, लेकिन यदि मृत्यु से पूर्व प्रभु की कृपा मिल जाए, तो जीव का कल्याण निश्चित है। कथा पंडाल में सैकड़ों श्रद्धालु भागवत की अमृत रस पान कर भाव विभोर हो गए। अंत सभी श्रद्धालुओं ने प्रसाद प्राप्त किया।
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