आज के समय सुदामा कृष्ण जैसा मित्रता देखने को नहीं मिलता है : भारती केशरी
-मसलिया प्रखंड क्षेत्र के नागरापाथर गांव में सात दिवसीय भागवत कथा का हुआ समापनआज के समय सुदामा कृष्ण जैसा मित्रता देखने को नहीं मिलता है : भारती केशरी

मसलिया, प्रतिनिधि। मसलिया प्रखंड क्षेत्र के नागरा पथर गांव में शुक्रवार को हवन यज्ञ के साथ सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा का समापन हुआ। आचार्य गोपाल झा ने वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ हवन यज्ञ करते हुए आहुति दी। भागवत कथा के अंतिम दिन गुरुवार को कथा वाचिक भारती केशरी ने श्रीकृष्ण की सोलह हजार एक सौ आठ शादी एवं सुदामा-कृष्ण की निस्वार्थ अटूट मित्रता पर प्रकाश डाला। कथावाचिका ने कहा कि आज के समय सुदामा कृष्ण जैसा मित्रता देखने को नहीं मिलता है। अभी लोग स्टेटस देखकर मित्रता करते है। उस समय श्रीकृष्ण जहां द्वारकाधीश थे।वहीं सुदामा झोपड़पट्टी में रहने वाले अत्यंत गरीब ब्राह्मण थे।
सुदामा ने कभी भी सपरिवार कई कई दिन भूखे रहने के बावजूद अपने मित्र से सहयोग के लिए कुछ नही मांगा। एक बार सुदामा अपने पत्नी सुशीला देवी के कहने पर मित्र से मिलने द्वारका पहुंचे। द्वारका के द्वार पर द्वारपाल के पूछने पर सुदामा ने बताया कि जाकर कृष्ण को कहो द्वार पर उसके बालसखा सुदामा मिलने आया है। द्वारपाल जब कृष्णा के पास पहुंचा उस समय श्रीकृष्ण भोजन करने के लिए बैठे थे। जैसे ही द्वारपाल ने बताया कि द्वार पर आपके मित्र सुदामा आपसे मिलने आया है। श्रीकृष्ण ने सुदबुद खोकर भोजन छोड़कर नंगे पैर दौड़ते हुए सुदामा के पास पहुंचे एवं गले लगा लिया। दो सखा गले मिलकर अश्रु नेत्र से आपस का हाल चाल पूछा। सुदामा को राजभवन के भीतर ले जाकर अपने हाथ से मित्र सुदामा का चरण धोए।सुदामा के काफी दूर से नंगे पैर आने के कारण पैर से खून बह रहा था। पुराने कपड़े जहां ताहा फट गया था। सुदामा की स्थिति देख कर श्रीकृष्ण की आंखों से आंसू बहने लगा। सुदामा ने अपने मित्र के लिए अपने गरीबी में भी एक मुट्ठी चावल साथ लाया था। लेकिन श्रीकृष्ण की धन संपदा देखकर सुदामा लज्जावश चावल को देने में संकोच के कारण अपने चावल की पोटली को छिपा रहा था, जिससे श्री कृष्ण ने देख लिया। श्री कृष्ण ने कहा कि सखा भाभी ने मेरे लिए क्या भेजा है। सुदामा ने मजबूर होकर चावल की पोटली सखा को दे दिया। श्रीकृष्ण ने वही चावल की पोटली से चावल लेकर आनंद से अपने पत्नी रुक्मिणी के साथ खाने लगा।इस स्थिति में भी सुदामा ने अपने दोस्त से कुछ मांग नहीं पाया। दो दिन बाद सुदामा द्वारका से घर लौटने पर पाया कि उसके झोपड़ी के पास द्वारका जैसा ही विशाल राज प्रसाद खड़ा है। जैसे अपने पत्नी की नाम लेकर पुकारने लगा, उसकी पत्नी महारानी की तरह सजधज कर महल से निकली। अपने सारी स्थिति के बारे में अवगत कराया। इस प्रकार सभी को संदेश दिया कि मित्र धन संपदा देखकर नहीं होता। अंत में प्रसाद वितरण के साथ समापन हुआ।फोटो-27दुमका-205, कैप्सन- मसलिया में आयेाजित भागवत कथा के समापन पर हवन कार्यक्रम में शामिल श्रद्धालु
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