नेहरु ने नोबेल खातिर मणिपुर की कबाव घाटी म्यांमार को दान कर दी थी? भाजपा सांसद के दावे की पूरी कहानी

लाइव हिन्दुस्तान, गोड्डा
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गोड्डा से भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने ऐसा ही दावा करते हुए लिखा- 10 मई 1953 को आज ही के दिन नेहरु जी ने हमारे मणिपुर के कबाव वैली को बर्मा/ म्यांमार को बिना किसी से पूछे दान दे दिया था। निशिकांत दुबे के दावों में कितना दम है? जानें कबाव वैली की पूरी कहानी।

नेहरु ने नोबेल खातिर मणिपुर की कबाव घाटी म्यांमार को दान कर दी थी? भाजपा सांसद के दावे की पूरी कहानी

क्या सच में देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने नोबेल पुरस्कार पाने की चाह में मणिपुर की कबाव घाटी म्यांमार को सौंप दी थी? भाजपा सांसद निशिकांत दुबे के एक दावे के बाद यह सवाल फिर चर्चा में है। दुबे ने दावा किया कि 10 मई 1953 को नेहरू ने “बिना किसी से पूछे” कबाव वैली बर्मा को दान कर दी थी। भाजपा सांसद ने ये दावा एक्स पर किया है। लेकिन क्या इतिहास भी यही कहता है? क्या सचमुच नेहरू ने भारत की जमीन “गिफ्ट” कर दी थी, या फिर यह ब्रिटिश काल से चला आ रहा एक पुराना सीमा विवाद था? आइए समझते हैं कबाव घाटी की पूरी कहानी।

जब ब्रिटिशों ने कबाव वैली को बर्मा को सौंप दिया

सबसे पहले थोड़ा समझते हैं कि ये कबाव वैली है कहां? कबाव वैली आज के म्यांमार में स्थित एक इलाका है। यह मणिपुर और म्यांमार के बीच चिंदविन नदी के पास पड़ने वाला इलाका है। पहले यह मणिपुर के प्रभाव में था। बाद में बर्मा/ म्यांमार के अधीन चला गया।

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, 1824-26 में ब्रिटिश और बर्मा की लड़ाई हुई तो मणिपुर ने अंग्रेजों का साथ दिया। युद्ध के बाद कबाव घाटी मणिपुर को दी गई। लेकिन 1834 में ब्रिटिश सरकार ने कबाव घाटी वापस बर्मा को दे दी। बदले में मणिपुर को सालाना मुआवजा दिया जाना तय कर दिया।

कबाब वैली

सालाना 6270 रुपये मणिपुर को मिलना तय था

भाजपा सांसद निशिकांत दुबे द्वारा शेयर किए गए दस्तावेजों में भी यही बताया गया है- यह मुआवाजा किराया नहीं बल्कि जमीन नुकसान के बदले अलाउंस जैसा था। ये रकम हर महीने 500 सिक्का रुपये थी। यानी उस समय के हिसाब से करीब 6270 रुपये सालाना। पहले ब्रिटिश सरकार देती थी, बाद में बर्मा की सरकार पर देनदारी बनी। आजादी के बाद भारत सरकार मणिपुर दरबार को यह राशि देती रही।

दावा, नेहरू ने कबाव वैली म्यामांर को दान कर दी

भाजपा सांसद निशिकांत दुबे के अलावा मणिपुर के कुछ राजनीतिक और राष्ट्रवादी समूह भी वैली दान देने की बात को मानते हैं। इनके मुताबिक, पंडित जवाहर लाल नेहरू ने बर्मा के प्रधानमंत्री U Nu के साथ समझौते के बाद कबाव वैली के मुद्दे को हमेशा के लिए बंद कर दिया। उन्होंने “कबाव वैली गिफ्ट कर दी।”

निशिकांत दुबे द्वारा शेयर किया गया दस्तावेजनिशिकांत दुबे द्वारा शेयर किया गया दस्तावेज

क्या सचमुच नेहरू ने वैली “दान” कर दी थी?

इंफाल रिव्यू ऑफ आर्ट्स एंड पॉलिटिक्स में पब्लिश लेख, 'A Historical Account of Kabaw Valley' के अनुसार- इतिहासकार और मुख्यधारा से जुड़े रिकॉर्ड मानते हैं कि 'दान या गिफ्ट करना' शब्द राजनीतिक आरोप ज्यादा है, कानूनी तथ्य कम। क्योंकि, कबाव वैली 1834 से ही बर्मा के प्रशासन में थी। भारत के नियंत्रण में वह क्षेत्र आजादी के समय नहीं था।

नेहरू ने भारत के नियंत्रण वाली जमीन सीधे उठाकर म्यांमार को नहीं दी है। बल्कि, उन्होंने मौजूदा सीमा व्यवस्था को स्वीकार कर लिया। और कंपनसेशन मिलना बंद हो गया। इसके बाद भारत-बर्मा सीमा को स्थिर रूप दिया गया। इस तरह कहा जा सकता है कि “नेहरू ने जमीन दान नहीं दी, बल्कि ब्रिटिश काल के फैसले को चुनौती नहीं दी।”

क्या नेहरू ने नोबेल पुरस्कार के लिए ऐसा किया?

ऐसा कोई भी आधिकारिक रिकॉर्ड सामने नहीं आया है, जिसमें यह कहा गया हो कि ये फैसला नोबेल पुरस्कार पाने के उद्देश्य से लिया गया था। मणिपुर से भाजपा सांसद राजकुमार रंजन सिंह ने भी 2020 में संसद परिसर में कबाव घाटी का मुद्दा उठाया था।

उन्होंने विदेश मंत्री एस जयशंकर से कहा था कि मणिपुर ने लगभग 22,210 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र खोया और इसके बदले कंपनसेशन दिया जाता था। उन्होंने यह भी कहा कि मणिपुर के लोग आज भी इसे “raw deal” मानते हैं। हालांकि, उन्होंने भी यह नहीं कहा था कि नेहरू ने नोबेल पुरस्कार के लिए यह फैसला लिया।

Ratan Gupta

लेखक के बारे में

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रतन गुप्ता एक डिजिटल हिंदी जर्नलिस्ट/ कॉन्टेंट प्रोड्यूसर हैं। वर्तमान में लाइव हिन्दुस्तान की स्टेट न्यूज टीम के साथ काम कर रहे हैं। वह क्राइम, राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर न्यूज आर्टिकल और एक्सप्लेनर स्टोरीज लिखते हैं।


रतन गुप्ता वर्तमान में लाइव हिन्दुस्तान (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में कंटेंट प्रोड्यूसर के तौर पर स्टेट न्यूज टीम में काम करते हैं। इस टीम में हिंदी पट्टी के 8 राज्यों दिल्ली-एनसीआर, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, गुजरात से जुड़ी खबरों की कवरेज करते हैं। उनका लेखन खास तौर से क्राइम, राजनीति और सामाजिक मुद्दों पर केंद्रित रहता है।


लाइव हिंदुस्तान में बीते 2 साल से काम करते हुए रतन ने ब्रेकिंग न्यूज, राजनीतिक घटनाक्रम और कानून-व्यवस्था से जुड़ी खबरों पर लगातार लेखन किया है। इसके साथ ही वह एक्सप्लेनर स्टोरीज लिखने में भी विशेष रुचि रखते हैं, जहां जटिल मुद्दों को सरल और तथ्यपरक भाषा में पाठकों के सामने रखते हैं।


रतन गुप्ता ने बायोलॉजी में ग्रेजुएशन किया है, जिसके बाद उन्होंने भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता की पढ़ाई की है। साइंस बैकग्राउंड होने के कारण उनकी न्यूज और एनालिसिस स्टोरी में साइंटिफिक टेंपरामेंट, लॉजिकल अप्रोच और फैक्ट-बेस्ड सोच साफ दिखाई देती है। वह किसी भी मुद्दे पर रिपोर्टिंग करते समय दोनों पक्षों की बात, मौजूद तथ्यों और आधिकारिक स्रोतों को प्राथमिकता देते हैं, ताकि यूजर तक संतुलित और भरोसेमंद जानकारी पहुंचे।


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