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निर्गुण ब्रह्म के परम पद में शाश्वत स्थिति ही शैवा अवस्था: अचार्य संपूर्णानंद अवधूत

आनंद मार्गप्रचारक संघ का जिलास्तरीय सेमिनार के दूसरे दिन अचार्य संपूर्णानंद अवधूत ने साधना की चार अवस्थाएं विषय पर प्रकाश...

निर्गुण ब्रह्म के परम पद में शाश्वत स्थिति ही शैवा अवस्था: अचार्य संपूर्णानंद अवधूत
Newswrapहिन्दुस्तान टीम,धनबादMon, 01 Aug 2022 01:02 AM
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धनबाद, कार्यालय संवाददाता

आनंद मार्गप्रचारक संघ का जिलास्तरीय सेमिनार के दूसरे दिन अचार्य संपूर्णानंद अवधूत ने साधना की चार अवस्थाएं विषय पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आध्यात्मिक साधना में मानवीय प्रगति एवं प्रत्हार योग के चार चरण है- यतमान, व्यतिरेक, एकेंद्रीय एवं वशिकार। चारों के विषय में विस्तार से समझाया।

प्रथम अवस्था अर्थात यतमान में मानसिक वृत्तियां चित्त की ओर उन्मुख होती हैं। साधना के इस प्रयास में नाकारात्मक प्रभावों या वृत्तियों को नियंत्रित करने का प्रयास होता है। इसमें आंतरिक एवं वाह्य बाधाएं या कठिनाइयां अष्ट पाश और षड् रिपु के रूप में आती है। दूसरी अवस्था आती है व्यतिरेक की। व्यतिरेक में साधक की वृत्तियां मन के चित्त से अहम तत्व की ओर उन्मुख होती हैं। इनमें कभी प्रत्हार होता है, कभी नहीं होता है। आंतरिक एवं बाह्य शत्रुओं पर आंशिक नियंत्रण हो जाता है तो कभी-कभी हार मान जाती है। तीसरी अवस्था एकेन्द्रीय में वृत्तियां मन के अहम तत्व से महत्व की ओर उन्मुख हो जाती है। सर्व प्रति विषय प्रत्याहित हो एक भाव में स्थित होता है और साधक को इस अवस्था में विभूति या ऐश्वर्या की प्राप्ति होती है।

संर्णानंद अवधूत ने चौथी अवस्था के बारे में बताते हुए कहा कि बशीकार में सभी वृत्तीय संपूर्ण रूप से महत्व से मूल परम सत्ता की ओर उन्मुख होती है और तब साधक की स्वभाव एवं स्वरूप में प्रतिष्ठा हो जाती है। मन आत्मा के पूर्ण नियंत्रण में रहता है। इसे ही भक्ति मनोविज्ञान में गोपीभाव या कृष्णशरण कहते हैं।

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