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25 सितम्बर, 2020|2:53|IST

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लोक कला के लिए खुले उच्च शिक्षा एवं शोध केंद्र : डॉ अंजनी

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बीबीएमकेयू के कुलपति डॉ अंजनी कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि कोई भी विमर्श तभी सार्थक होगी, जब उसमें मौजूदा चिंताओं एवं समस्याओं का उचित समाधान निकले। लोगों में जागृति आए। लोगों में सकारात्मक ऊर्जा एवं संवेदना का संचार हो। लोक कला एवं साहित्य को जीवित रखने के लिए उच्च शिक्षण संस्थानों में और झारखंड जैसे आदिवासी बहुल राज्यों में अलग से विश्वविद्यालय व शोध केंद्र खुलने चाहिए। कुलपति सोमवार को नवजीवन रिसर्च एंड डेवलपमेंट सोसाइटी धनबाद, ह्यूमन इम्पावरमेंट एंड डेवलपमेंट सोसाइटी वाराणसी एवं लोक सेवा आश्रम विष्णुपुर बांका, बिहार के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय ऑनलाइन अंतराष्ट्रीय साहित्य समागम के समापन समारोह को संबोधित कर रहे थे।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे पद्मश्री मुकुंद नायक ने समकालीन भारत में लुप्त होती लोक संस्कृति पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि लोक कला एवं संस्कृति के बिना साहित्य मृतप्राय एवं अर्थहीन है। युवा साहित्यकारों को लोक साहित्य के विषय पर शोध कार्य करना चाहिए। मुख्य वक्ता बीएचयू हिंदी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. चौथीराम यादव ने कहा कि कबीर एवं मीरा को छोड़ कर समकालीन चिंताओं पर विमर्श बेईमानी होगी।

कार्यक्रम को दिल्ली से प्रो. राजेश पासवान, डॉ राम चंद्रा, डॉ कालीचरण स्नेही, डॉ शशि शेखर, डॉ अनीता भारती, डॉ अनिश कुमार समेत अन्य ने संबोधित किया। कार्यक्रम का संचालन संयोजक डॉ श्याम किशोर प्रसाद, डॉ निलेश कुमार, प्रो. रामचंद्र कुमार, डॉ मुकुंद रविदास, प्रो. एतवा टूटी मौजूद थे।

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  • Web Title:Open Higher Education and Research Center for Folk Arts Dr Anjani