
प्रिंटिंग यूनिट के बिना छह माह से पोर्टेबल एक्स-रे मशीन बेकार
धनबाद में छह पोर्टेबल एक्स-रे मशीनें पिछले छह महीनों से बेकार पड़ी हैं। इन मशीनों का उपयोग नहीं हो पा रहा है क्योंकि प्रिंटिंग यूनिट उपलब्ध नहीं है। अन्य जिलों में भी यही स्थिति है, जिससे मरीजों को प्राइवेट सेंटरों पर जाना पड़ रहा है। यह स्थिति गरीब मरीजों के लिए आर्थिक बोझ बन गई है।
धनबाद, प्रमुख संवाददाता। धनबाद में प्रिंटिंग यूनिट के बिना छह पोर्टेबल एक्स-रे मशीनें छह माह से बेकार पड़ी हैं। इस साल जून और जुलाई में राज्य के कई जिलों को पोर्टेबल एक्स-रे मशीनें भेजी गई थीं। छह माह बीतने के बाद भी मशीनें उपयोग में नहीं लाई जा सकी हैं। धनबाद में छह पोर्टेबल एक्स-रे मशीनें अब भी बेकार पड़ी हैं। इसका मुख्य कारण प्रिंटिंग यूनिट (इमेज प्रिंटिंग डिवाइस) अबतक उपलब्ध नहीं कराया जाना है और न ही कैसेट भेजा गया है। इस कारण मशीनें संचालित नहीं हो रही हैं। छह मशीनों की कीमत लगभग 14 लाख रुपए है, जिनमें तीन मशीनें सदर अस्पताल में रखी हैं।
वहीं बाघमारा, तोपचांची और निरसा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी) को मशीनें भेजी गई हैं। सभी जगहों पर स्थिति एक जैसी है। कहीं उसे चालू नहीं किया जा सका है। स्वास्थ्य अधिकारियों के अनुसार आधुनिक तकनीक से एक्स-रे मशीनें लैस हैं और आपातकालीन सेवा, दुर्घटना मामले, ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों और दूरदराज क्षेत्रों के मरीजों को तत्काल लाभ पहुंचाने में सहायक हो सकती है, लेकिन प्रिंटिंग यूनिट नहीं मिलने के कारण उसका इस्तेमाल नहीं हो रहा है। सदर अस्पताल में तीन मशीनें स्टोर रूम में ढंकी पड़ी हैं। अन्य जिलों में भी यही स्थिति: धनबाद अकेला जिला नहीं है, जहां यह समस्या है। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के अनुसार राज्य के कई जिलों में भी मशीनें भेजी गई हैं। प्रिंटिंग यूनिट कहीं नहीं भेजी गई है, जिससे मशीनें अब भी पैक्ड अवस्था में पड़ी हैं। करोड़ों की लागत से खरीदे गए उपकरण व्यर्थ साबित हो रहे हैं। डिजिटल एक्स-रे होगी: अधिकारियों का कहना है कि एक्स-रे मशीनें डिजिटल फॉर्मेट में एक्स-रे कैप्चर करती हैं। यह काफी बेहतर होता है, लेकिन प्रिंटिंग यूनिट या डिजिटल डिस्प्ले सिस्टम नहीं होने से इमेज न तो प्रिंट हो रहा है और न डॉक्टर उसका उपयोग कर पा रहे हैं। सरकारी एक्स-रे मशीनों का उपयोग नहीं होने के कारण मरीजों को प्राइवेट केंद्रों में जाना पड़ रहा है, जिससे गरीब मरीजों पर आर्थिक बोझ पड़ रहा है।

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