तीन दिग्गज फेल, नगर निगम चुनाव में भाजपा का गढ़ दरका

Mar 01, 2026 03:17 am ISTNewswrap हिन्दुस्तान, धनबाद
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धनबाद नगर निगम चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार संजीव सिंह की जीत ने भाजपा की राजनीतिक साख पर सवाल खड़े कर दिए हैं। भाजपा समर्थित उम्मीदवार संजीव कुमार पहले राउंड से ही पिछड़ गए। यह परिणाम बताता है कि स्थानीय मुद्दों पर वोटर्स ने विपक्षी दलों को प्राथमिकता दी। भाजपा की पकड़ कमजोर होती दिख रही है।

तीन दिग्गज फेल, नगर निगम चुनाव में भाजपा का गढ़ दरका

धनबाद नगर निगम चुनाव का परिणाम ने भाजपा की राजनीति साख पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है। मेयर पद पर निर्दलीय उम्मीदवार संजीव सिंह की शानदार जीत ने न सिर्फ मुकाबले को एकतरफा बना दिया, बल्कि भाजपा की संगठनात्मक ताकत और उसके जनाधार के दावों को भी कमजोर साबित कर दिया है। भाजपा का गढ़ माने जाने वाले धनबाद में पार्टी समर्थित उम्मीदवार संजीव कुमार की करारी हार राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बनी हुई है। लोग कहने लगे हैं कि धनबाद में भाजपा का गढ़ अब दरक गया है। इस चुनाव में भाजपा के सांसद ढुलू महतो और पार्टी के दो विधायक राज सिन्हा तथा शत्रुघ्न महतो की प्रतिष्ठा भी दांव पर थी।

तीनों नेताओं ने खुलकर पार्टी समर्थित उम्मीदवार के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश की। इसके बावजूद संजीव कुमार पहले राउंड से ही मुकाबले में पिछड़ते नजर आए। वे कभी भी निर्दलीय उम्मीदवार संजीव सिंह के वोटों के आसपास नहीं पहुंच सके। उनकी स्थिति तीसरे और चौथे स्थान के बीच ही झूलती रही। चुनाव परिणाम ने स्थानीय स्तर पर भाजपा की पकड़ कमजोर होने का महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत दिया है। भाजपा समर्थित उम्मीदवार को न तो संगठन का पूरा लाभ मिला और न ही जनसमर्थन। संजीव कुमार पहले राउंड से ही रेस से बाहर हो गए थे। उनकी असली लड़ाई तीसरे स्थान के लिए रही, जहां उन्हें कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार शमशेर आलम से कड़ी टक्कर मिली। मतगणना के पहले दो राउंड में संजीव कुमार ने शमशेर आलम पर बढ़त बनाई, लेकिन तीसरे राउंड में शमशेर आलम आगे निकल गए। चौथे राउंड में संजीव कुमार फिर तीसरे स्थान पर पहुंचे पर इसके बाद वे लगातार पिछड़ते गए और अंतिम परिणाम तक चौथे स्थान पर ही रहे। इस चुनाव में पूर्व मेयर और झामुमो समर्थित उम्मीदवार चंद्रशेखर अग्रवाल दूसरे स्थान पर बने रहे। उन्होंने पहले राउंड से ही भाजपा समर्थित उम्मीदवार को पीछे छोड़ दिया था। इससे यह स्पष्ट हो गया कि इस चुनाव में विपक्षी दलों की रणनीति भाजपा के धुरंधरों से अधिक प्रभावी रही और मतदाताओं ने विकास और स्थानीय मुद्दों को भी प्राथमिकता दी। राजनीतिक के जानकारों का मानना है कि यह परिणाम सांसद और विधायकों की साख के लिए भी चुनौती है। तीनों नेताओं का संयुक्त प्रभाव भी पार्टी समर्थित उम्मीदवार को मजबूत स्थिति में नहीं ला सका। इस चुनाव के परिणाम ने स्थानीय स्तर पर भाजपा के भीतर की गुटबाजी और कार्यकर्ताओं की निष्क्रियता को भी सामने ला दिया है। निर्दलीय उम्मीदवार की शानदार जीत से यह भी स्पष्ट हो चुका है कि मतदाता अब पार्टी लाइन से हटकर भी फैसला लेने को तैयार हैं। विधानसभा और लोकसभा चुनाव के लिए चेतावनी लोग धनबाद जैसे शहरी क्षेत्र में भाजपा की कमजोर प्रदर्शन को आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों के लिए चेतावनी की तरह देख रहे हैं। इससे यह स्पष्ट हो गया है कि भाजपा का संगठन और जनसंपर्क तंत्र कमजोर पड़ चुका है। स्थानीय राजनीति में समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। इसका असर जिला में पार्टी के पूरे राजनीतिक परिदृश्य पर भी पड़ सकता है।

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