कृष्ण-सुदामा की मित्रता से सीख लेने का आह्वान
कतरास स्थित राजस्थानी धर्मशाला में श्रीमद्भागवत कथा के सातवें दिन भारी श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी। कथा व्यास आचार्य कृष्ण द्विवेदी ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता का महत्व बताया। उन्होंने कहा कि सच्ची मित्रता को धन-दौलत से नहीं, बल्कि प्रेम और समर्पण से मापना चाहिए।

कतरास स्थित राजस्थानी धर्मशाला में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के सातवें दिन श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। कथा व्यास काशी से पधारे आचार्य कृष्ण द्विवेदी जी महाराज ने भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा की अमर मित्रता का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि आज के दौर में मित्रता दिखावे तक सीमित होती जा रही है।
मित्रता का महत्व
सोशल मीडिया पर हजारों मित्र होने के बावजूद संकट के समय बहुत कम लोग साथ खड़े दिखाई देते हैं। उन्होंने कहा कि श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता नि:स्वार्थ प्रेम, समर्पण और सच्चे संबंधों का अनुपम उदाहरण है। सुदामा निर्धन और विपन्न थे, जबकि श्रीकृष्ण द्वारका के राजा एवं समस्त वैभव के स्वामी थे। इसके बावजूद जैसे ही श्रीकृष्ण को अपने मित्र सुदामा के आगमन की सूचना मिली, वे नंगे पांव दौड़कर उनका स्वागत करने पहुंचे।
सच्ची मित्रता
उन्होंने सुदामा को गले लगाया, सम्मानपूर्वक सिंहासन पर बैठाया और उनके द्वारा लाए गए चावल को प्रेमपूर्वक स्वीकार किया। आचार्य ने कहा कि भगवान भक्तों के प्रेम और भाव के भूखे होते हैं। सच्ची मित्रता में धन-दौलत, पद और प्रतिष्ठा का कोई महत्व नहीं होता। कथा के दौरान परीक्षित मोक्ष प्रसंग का भी वर्णन किया गया। सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा के समापन पर श्रद्धालुओं ने भक्ति भाव से कथा श्रवण कर धर्मलाभ प्राप्त किया।
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