फाल्गुन में फल-फूल का त्याग कर बाहा मानना है संथाली समाज
होली से एक दिन पूर्व आदिवासी समाज बाहा पर्व मनाता है। संताली आदिवासियों के लिए यह पर्व विशेष महत्व रखता है। इसमें नवदंपति की खुशहाली और वंश वृद्धि की कामना की जाती है। ग्राम देवता की पूजा और चंगना की बलि दी जाती है। इस दिन रंगों से दूर रहना परंपरा है।

होली से एक दिन पूर्व आदिवासी समाज बाहा पर्व मनाता है। संताली आदिवासियों में बाहा पर्व का विशेष महत्व है। शिक्षाविद कालेश्वर किस्कू बताते हैं कि बाहा का अर्थ होता है फूल। आदिवासी प्रकृति पूजक होते हैं। इस मौसम में प्रत्येक वृक्ष पर कपोल, फूल, मंजर और फल लगते हैं। बाहा पर्व तक पूरे फाल्गुन संताली न तो नए फूल खाते हैं न फल। होली के एक दिन पूर्व पारंपरिक तौर से बाहा पर्व मनाया जाता है। बाहा दरअसल चैत्र मास में मनाया जाने वाले पर्व दिशोम बाहा की शुरुआत है। नवदंपति के खुशहाल जीवन की कामना संताली परंपरा के अनुसार नवदंपति का एक वर्ष पूर्व जिस मड़वा में विवाह हुआ था, उसी मंडप में चंगना की बलि दी जाती है।
चंगना (छोटी मुर्गी) की बलि देकर खुशहाल जीवन और वंश वृद्धि की कामना की जाती है। कालेश्वर किस्कू बताते हैं कि तीन मुर्गियों की बलि दी जाती है। एक जाहेर थान के नाम, एक गांव के नाम और एक खुद के नाम की। बीमारियों से बचाव और अच्छी खेती और के लिए मांगते हैं आशीर्वाद होली से एक दिन पूर्व ग्राम देवता की पूजा होती है। सुबह में जाहेर थान में पांरपरिक पूजा होती है तो वहीं रात्रि में लोग जाहेर थान पहुंच कर मरांग बुरु से पूरे वर्ष अच्छी खेती और बीमारियों से रक्षा का आशीर्वाद मांगते हैं। इस दिन नायकी घर में जमीन पर सोते हैं। इससे पूर्व चूरुय चाली (गांव में भिक्षाटन) की जाती है। यहां से प्राप्त खाद्य सामग्री से खिचड़ी बनती है और यही प्रसाद स्वरूप पूरा गांव खाता है। परंपरा के अनुसार इस प्रसाद को महिलाएं नहीं खाती हैं। वहीं दूसरी ओर बाहा पर्व में भाग लेने वालों के लिए रंग पूर्णतः वर्जित है। जब तक यह त्योहार संपन्न नहीं हो जाता, रंग से दूर रखा जाता है। यहां तक कि मुख्य पुजारी (नायकी) रंग से बचने के लिए पूरे फाल्गुन घर के बाहर नहीं निकलते हैं।
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