कान्हा के गीतों से कृष्ण के रास्तों तक, देवऋषि की नई यात्रा मथुरा से द्वारका
देवऋषि श्रीकृष्ण से जुड़े सांस्कृतिक मार्गों पर शोध कर रहे हैं। इस क्रम में मथुरा में जन्म, गोकुल, नंदगांव और वृंदावन के बाल्यकाल, फिर मथुरा, उज्जैन में गुरु सांदीपनि से जुड़ी परंपरा, द्वारका तक फैली कृष्ण कथा को ग्रंथों, स्थानीय मान्यताओं, मंदिरों, जीवित सांस्कृतिक स्मृतियों के साथ देखा जा रहा है।

जन्माष्टमी के आसपास जहां नए भजन, कीर्तन और कृष्ण गीतों की रौनक बढ़ जाती है, वहीं संगीतकार, दार्शनिक और शोधकर्ता देवऋषि इस बार अपनी कृष्ण यात्रा को संगीत से आगे सांस्कृतिक भूगोल तक ले जा रहे हैं। ‘कृष्ण स्तुति’ के 15 मिलियन से अधिक व्यूज और हालिया गीत ‘कान्हा शरमात है’ के बाद अब उनका फोकस उन रास्तों और स्थानों पर है, जहां भारतीय परंपरा श्रीकृष्ण के जीवन की अलग-अलग अवस्थाओं को याद करती है।
कृष्ण से जुड़े सांस्कृतिक मार्गों की कर रहे हैं खोज
देवऋषि पिछले कुछ समय से श्रीकृष्ण से जुड़े सांस्कृतिक मार्गों पर शोध कर रहे हैं। इस क्रम में मथुरा में जन्म, गोकुल, नंदगांव और वृंदावन के बाल्यकाल, फिर मथुरा वापसी, उज्जैन में गुरु सांदीपनि से जुड़ी परंपरा और आगे द्वारका तक फैली कृष्ण कथा को ग्रंथों, स्थानीय मान्यताओं, मंदिरों और जीवित सांस्कृतिक स्मृतियों के साथ देखा जा रहा है। उनके लिए इस यात्रा का सबसे रोचक पक्ष केवल स्थान नहीं, बल्कि कृष्ण की बदलती हुई छवि है। गोकुल और ब्रज में कृष्ण चंचल बालक, गोपाल और प्रेम के प्रतीक के रूप में दिखाई देते हैं, जबकि आगे के प्रसंगों में वही कृष्ण विद्यार्थी, रणनीतिकार, शासक और अंततः अर्जुन के सारथी के रूप में सामने आते हैं।
उज्जैन से द्वारका तक
इसी शोध को अब ‘ट्रैकिंग कृष्णा विथ देवऋषि’ नाम की डॉक्यूमेंट्री श्रृंखला में विकसित किया जा रहा है। इसमें मथुरा से गोकुल, नंदगांव, वृंदावन, उज्जैन और आगे द्वारका तक जुड़े स्थानों को केवल धार्मिक यात्रा की तरह नहीं, बल्कि एक कल्चरल ट्रेल के रूप में देखा जाएगा। लोककथाएं, मंदिर परंपराएं, स्थानीय स्मृतियां, पुराने मार्ग, क्षेत्रीय संगीत और इतिहास से जुड़े संदर्भ इस श्रृंखला का हिस्सा होंगे।
देवऋषि के अनुसार कृष्ण को किसी एक भाव में सीमित करना मुश्किल है। यही बात उनके संगीत में भी लगातार दिखाई देती है। ‘कृष्ण स्तुति’ में जहां ध्यान और गंभीरता का भाव था, वहीं ‘कान्हा शरमात है’ में कृष्ण का चंचल और प्रेमपूर्ण पक्ष सामने आता है।
“गोवर्धन उठाने वाला कृष्ण वही है जो राधा के सामने संकोच करता है। यही विरोधाभास नहीं, बल्कि पूर्णता है,” देवऋषि कहते हैं। उनके मुताबिक कृष्ण की लोकप्रियता की एक बड़ी वजह यही है कि वे शक्ति, प्रेम, मित्रता, करुणा, राजनीति और दर्शन जैसे कई भावों में एक साथ मौजूद दिखाई देते हैं।
जन्माष्टमी से ही देवऋषि की संगीत यात्रा ने ध्यान और ध्वनि-आधारित वेलबींग की दिशा भी पकड़ी है। साधनम के तहत मंत्र-ध्यान, मीडिएशन म्यूजिक, कीर्तन, राग-आधारित संगीत और साउंड फोकस्ड वेलबींग फॉर्मेट्स की नई श्रृंखलाएं शुरू की गई हैं। यहां संगीत को केवल डिवोसनल रिलीज की तरह नहीं, बल्कि ध्यान, मानसिक शांति और भावनात्मक संतुलन के अनुभव से जोड़ा जा रहा है।
इस विस्तार में भक्ति और वेलनेस के बीच एक नया प्रयोग दिखाई देता है। भारतीय परंपरा में मंत्र, राग और कीर्तन लंबे समय से मनःस्थिति और साधना से जुड़े रहे हैं, जबकि सदनाम इन्हें आधुनिक मीडिएशन फॉर्मेट के साथ प्रस्तुत करने की दिशा में काम कर रहा है।
देवऋषि की आगामी पुस्तक ‘सारथी’ भी इसी व्यापक कृष्ण-दृष्टि को आगे बढ़ाती है। इसमें कृष्ण को संबंधों, निर्णय, नेतृत्व और व्यक्तिगत जिम्मेदारी के संदर्भ में पढ़ने की कोशिश होगी, जबकि डॉक्यूमेंट्री उनके सांस्कृतिक भूगोल और स्मृतियों को दृश्य रूप में सामने लाएगी।
इस तरह जन्माष्टमी पर देवऋषि की कृष्ण यात्रा केवल नए गीतों तक सीमित नहीं है। एक ओर उनका संगीत कृष्ण के अलग-अलग भावों को पकड़ रहा है, दूसरी ओर ‘ट्रैकिंग कृष्णा विथ देवऋषि’ मथुरा से द्वारका तक फैली सांस्कृतिक स्मृतियों को जोड़ने की कोशिश कर रहा है, और साधनम के जरिए वही संगीत ध्यान, मंत्र और रागों की नई दिशा में आगे बढ़ रहा है।


