निबंध लेखन में आकांक्षा व रंगभरो प्रतियोगिता में पूनम ने मारी बाजी
देवघर,प्रतिनिधि। स्वामी विवेकानंद की जयंती पर स्थानीय विवेकानंद शैक्षणिक, सांस्कृतिक एवं क्रीड़ा संस्थान के बैनर तले विद्यार्थियों के बीच निबंध लेखन एव

स्वामी विवेकानंद की जयंती पर स्थानीय विवेकानंद शैक्षणिक, सांस्कृतिक एवं क्रीड़ा संस्थान के बैनर तले विद्यार्थियों के बीच निबंध लेखन एवं रंगभरो प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया। जिसमें विभिन्न विद्यालयों के विद्यार्थियों ने बढ़ चढ़कर अपनी भागीदारी निभाई। वर्ग सप्तम से द्वादश तक के विद्यार्थियों के बीच स्वामी विवेकानंद एवं भारत शीर्षक निबंध लेखन प्रतियोगिता में आशुतोष बालिका उच्च विद्यालय रोहिणी की आकांक्षा कुमारी को प्रथम, दीनबंधु उच्च विद्यालय की आस्था कुमारी एवं करिश्मा कुमारी को क्रमशः द्वितीय एवं तृतीय स्थान प्राप्त हुआ। वर्ग पंचम से अष्टम तक विद्यार्थियों के बीच रंगभरो प्रतियोगिता में भारती विद्यापीठ की पूनम कुमारी को प्रथम, दीनबंधु स्कूल के सत्यम केशरी को द्वितीय जबकि आशुतोष विद्यालय की प्राची व नवल किशोर पाण्डेय को तृतीय स्थान प्राप्त हुआ है।
मौके पर वेक्सो इंडिया के केंद्रीय अध्यक्ष डॉ. प्रदीप कुमार सिंह देव ने कहा कि विवेकानंद बचपन से ही मेधावी थे। उन्होंने ईश्वर चंद्र विद्यासागर के संस्थान से पढ़ाई की और कोलकाता विश्वविद्यालय से बीए की डिग्री प्राप्त की। जहां उन्होंने पश्चिमी दर्शन, विज्ञान और भारतीय ग्रंथों का गहन अध्ययन किया। नवंबर 1881 में उनकी भेंट संत रामकृष्ण परमहंस से हुई, जिसने उनके जीवन में क्रांतिकारी बदलाव लाया और वे उनके प्रिय शिष्य बन गए। 25 साल की उम्र में सांसारिक मोह त्याग कर उन्होंने संन्यास ले लिया और विवेकानंद नाम धारण किया। 1893 में वे शिकागो विश्व धर्म सम्मेलन में भाग लेने अमेरिका गए, जहां अमेरिकी वासियों, बहनों और भाइयों' कहकर उन्होंने दुनिया का ध्यान आकर्षित किया और भारतीय आध्यात्म का प्रचार किया। उन्होंने तीन साल अमेरिका में रहकर वेदांत और योग का प्रचार किया और भारतीय संस्कृति को पश्चिमी दुनिया से जोड़ा। उन्होंने अपने गुरु के नाम पर रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशन की स्थापना की, जो समाज सेवा और शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत हैं। उन्होंने राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्षता, मानवतावाद और शिक्षा पर अपने विचार दिए, जो उपनिषदों, गीता और बुद्ध के उपदेशों से प्रभावित थे। उन्होंने भारतीय दर्शन को पश्चिमी दुनिया से जोड़ा और आधुनिक भारत के महान देशभक्त संत के रूप में पहचान बनाई। 4 जुलाई 1902 को मात्र 39 वर्ष की अल्पायु में उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी शिक्षाएं और आदर्श आज भी युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत हैं।

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