गौपालन से संवरी किस्मत, दूध बेचकर आत्मनिर्भर बनीं गाँव की महिला
सफलता की गूंज: गौपालन से संवरी किस्मत, दूध बेचकर आत्मनिर्भर बनीं गाँव की महिलासफलता की गूंज: गौपालन से संवरी किस्मत, दूध बेचकर आत्मनिर्भर बनीं गाँव की

मयूरहंड प्रतिनिधि आज के दौर में जहां लोग नौकरी के पीछे भाग रहे हैं, वहीं ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं ने अपनी मेहनत और लगन से स्वरोजगार की नई इबारत लिखनी शुरू कर दी है। इसका जीवंत उदाहरण बेलखोरी गांव के सूर्यभान कुशवाहा के पत्नी वीणा देवी ने पेश किया है। वीणा ने एक गाय अपने मामा के घर से लाकर गाय पालन शुरू किया। इसके बाद दूसरी गाय 18 हजार में खरीदकर लाई। आज के समय में इनके पास पांच गाय दुधारू है। जिससे करीब 40 हजार रुपए प्रतिमाह की आमदनी कर रही है। पति पेंटिंग का काम बाहर में करते हैं।
इस काम को वीणा खुद संभालती है। उसने बताया कि बैठ कर समय गंवाने से अच्छा है कि अपने आप को व्यस्त रखना। एक घंटा सुबह और एक घंटा शाम को मैं इनको समय देती हूं। आज के समय में पैसे का मोहताज नहीं हूं। दूध के पैसे से एक स्कूटी खरीदी हूं जिससे दूध को पहुंचाने का काम आता है। मेहनत करने पर अच्छा फायदा है। धीरे-धीरे गाय की संख्या और बढ़ा रही हूं। समय पर ध्यान देने से सब कुछ संभव है। समाज के लिए बनी प्रेरणा शून्य से शिखर तक का सफर कभी घर का खर्च चलाने के लिए संघर्ष करने वाली इस महिला ने हार नहीं मानी। उन्होंने निर्णय लिया कि वे परंपरागत खेती के साथ-साथ गोपालन का कार्य करेंगी। दुधारू गायों का पालन शुरू किया। एक गाय से काम शुरू किया आज महिला के पास छह गाय है। बताया कि शुरुआती दौर में चुनौतियां बहुत थीं, लेकिन उनके हौसले के आगे हर बाधा छोटी साबित हुई। दूध की मिठास से बढ़ रही आमदनी आज वे प्रतिदिन भारी मात्रा में शुद्ध दूध की बिक्री स्थानीय डेयरी में कर रही हैं। दूध बेचकर होने वाली आमदनी से उन्होंने न केवल अपने बच्चों को अच्छे स्कूलों में दाखिल कराया, बल्कि गायों के रहने के लिए सुविधा भी बढ़ाया है। वे बताती हैं कि दूध के साथ-साथ वे गोबर की खाद (वर्मी कंपोस्ट) का उपयोग भी अपने खेतों में कर रही हैं, जिससे लागत कम और मुनाफा बढ़ गया है। महिलाओं के लिए बनीं रोल मॉडल आज वीणा देवी के घर पर आसपास की दर्जनों महिलाएं सलाह लेने आती हैं। उन्होंने साबित कर दिया है कि यदि इच्छाशक्ति मजबूत हो, तो गांव की पगडंडियों से भी सफलता का रास्ता निकल सकता है। क्षेत्र के पशुपालन अधिकारी का कहना है कि ऐसी सफलता की कहानियां अन्य ग्रामीणों को भी स्वरोजगार से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित करती हैं। शुरुआत में लोग संदेह करते थे, लेकिन आज जब मैं अपने पैरों पर खड़ी हूँ, तो वही लोग सम्मान देते हैं। गौपालन ने मुझे आर्थिक आजादी दी है। बताया कि अगर सरकारी सुविधा मिले तो मैं और भी आगे बढ़ सकती हूं । पार्ट टाइम समय का करती है उपयोग बेलखोरी गांव की महिला पार्ट टाइम का उपयोग करती है। महिला सभी गाय को अपने से प्रतिदिन दूध निकाल कर स्कूटी पर डाल कर घर से करीब दो किलोमीटर दूर मयूरहंड में दूध संग्रहालय केंद्र में दूध पहुंचती है। हाउस वाइफ के अलावा दूध उत्पादन का कार्य करती है। कहा शाम सुबह का खाली समय में जो समय इधर उधर बैठकर समय जाता था मै उसका केवल उपयोग किया हूं। फोटो1- अपनी गायों को निहारती महिला *-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-
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