
उपभोक्ता आयोग ने एफडी बताकर बीमा पॉलिसी बेचने पर एसबीआई लाइफ को 4.50 लाख लौटाने का दिया आदेश
चाईबासा के जिला उपभोक्ता विवाद आयोग ने बीमा कंपनी एसबीआई लाइफ इंश्योरेंस द्वारा किए गए भ्रामक व्यापार व्यवहार पर निर्णय दिया। शिकायतकर्ता लक्ष्मी पुर्ती ने बताया कि बैंक में फिक्स्ड डिपॉजिट के लिए गई थीं, लेकिन उनकी राशि बीमा पॉलिसी में निवेश कर दी गई। आयोग ने ₹4 लाख की राशि 45 दिनों में लौटाने का आदेश दिया।
चाईबासा।जिला उपभोक्ता विवाद आयोग ने एक अहम फैसले में बीमा कंपनी द्वारा किए गए भ्रामक व धोखापूर्ण बीमा विक्रय को अनुचित व्यापार व्यवहार करार देते हुए एसबीआई लाइफ इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को उपभोक्ता को राहत प्रदान करने का आदेश दिया है। आयोग ने एसबीआई लाइफ इंश्योरेंस कंपनी चार लाख रुपये की संपूर्ण राशि 45 दिनों के भीतर वापस करने , इसके अतिरिक्त, शिकायतकर्ता को 40 हजार रुपया मानसिक पीड़ा हेतु एवं 10 हजार रुपया वाद व्यय के रूप में अदा करने को कहा है। यदि 45 दिनों में भुगतान नहीं किया गया तो राशि पर 9% वार्षिक ब्याज देय होगा। क्या है मामला मंझारी थाना क्षेत्र की तुईबाना गांव निवासी लक्ष्मी पुर्ती ने उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग को अपनी शिकायत में बताया कि वह अपनी माता जेमा कुई पुर्ती के साथ भारतीय स्टेट बैंक, चाईबासा शाखा में फिक्स्ड डिपॉजिट कराने गई थीं, लेकिन बैंक कर्मियों ने उन्हें एसबीआई लाइफ के प्रतिनिधि के पास भेज दिया।

वहां उनसे विभिन्न कागजातों पर हस्ताक्षर करवा लिए गए और बाद में पता चला कि 2 लाख रुपये की राशि रिटायर स्मार्ट प्लस बीमा पॉलिसी में निवेश कर दी गई।शिकायतकर्ता का कहना था कि उन्हें यह विश्वास दिलाया गया कि एफडी की जा रही है, जबकि वास्तविकता में बीमा पॉलिसी जारी कर दी गई। जब उन्होंने पॉलिसी रद्द कर राशि लौटाने की मांग की तो बीमा कंपनी द्वारा सहयोग नहीं किया गया। इसके अतिरिक्त, ऑटो-डेबिट के माध्यम से पुनः 2 लाख की कटौती भी कर ली गई, जिससे शिकायतकर्ता को मानसिक एवं आर्थिक पीड़ा झेलनी पड़ी।आयोग ने अपने निर्णय में कहा किबीमा कंपनी यह साबित करने में असफल रही कि उपभोक्ता को बीमा उत्पाद की पूर्ण व स्पष्ट जानकारी दी गई थी।ई-साइन, ओटीपी सत्यापन एवं डिजिटल वेलकम कॉल से संबंधित कोई भी दस्तावेज या साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए।बीमा उत्पाद को एफडी के रूप में प्रस्तुत करना अनुचित व्यापार व्यवहार है।प्रारंभिक सहमति ही धोखे से प्राप्त की गई, जिससे अनुबंध शून्य हो जाता है। आयोग ने स्पष्ट संदेश दिया है कि बीमा के नाम पर एफडी बताकर धन लेना कानूनन अपराध है और ऐसी कंपनियों को जवाबदेह ठहराया जाएगा।

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