कांचही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए...

Oct 26, 2025 11:54 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, बोकारो
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बोकारो में छठ महापर्व की शुरुआत हो गई है। भक्तिपूर्ण गीतों के बीच व्रती सूर्य की उपासना करने के लिए नदियों और तालाबों पर एकत्रित हुए हैं। सोमवार को अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा और मंगलवार को...

कांचही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए...

बोकारो। कांचही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाये। बनी ना कवन बाबा कहरिया, बहंगी घाटे पहुंचाये...। ऐसे ही भक्तिपू्र्ण गीतों की गूंज के बीच जिलेभर में सूर्योपासना का महापर्व छठ शुरू हो गया है। सोमवार को जहां अस्ताचलगामी भगवान भास्कर को अर्घ्य दिया जाएगा वहीं मंगलवार को उदयगामी भगवान सूर्य को अर्घ्य के साथ महापर्व का समापन होगा। इस दौरान जिले के सभी नदियों के साथ साथ तालाबों में व्रतियों की भीड़ रहेगी। चार दिनों तक चलनेवाला यह पर्व अत्यंत कष्टसाध्य, किंतु अपार फलदायी माना जाता है। पिछले कई दशकों से महापर्व छठ चास, बोकारो में भी अटूट आस्था, श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक बन गया है।

नदी तालाब के छठ घाटों पर छठ व्रतियों की भीड़ देखते ही बनती है। चास बोकारो के बाजार छठ के सामानों से सज धज कर तैयार है। शहर से लेकर गांव के घाटों को आकर्षक लाईटिंग के साथ सजाया गया है। जिला प्रशासन की ओर से भी छठ घाटों में साफ सफाई सहित व्रतियों की सुविधा को लेकर लगातार मॉनिटरिंग की जा रही है। स्वयं उपायुक्त बोकारो अजय नाथ झा घाटों का भौतिक निरीक्षण करने के बाद अधिकारियों को आवश्यक दिशा निर्देश दिया है। सांब को कुष्ठ रोग से मिली थी मुक्ति : छठ पर्व के बारे में स्थापित मान्यता के अनुसार अत्यंत सुंदर और आकर्षक व्यक्तित्व के धनी कृष्ण के पुत्र सांब को किसी शाप से कुष्ठ रोग हो गया था। जिससे मुक्ति के लिए ब्रह्मा के मानस पुत्र नारद की सलाह पर उन्होंने भगवान भास्कर की उपासना की। जिसके बाद उन्हें कष्टों से मुक्ति मिली। माना जाता है तभी से सूर्योपासना के महापर्व की शुरूआत हुई। सूर्य के साथ-साथ छठ अथवा षष्ठी की पूजा भी माता के रूप में की जाती है। जो कार्तिकेय की पत्नी है। यह देवी संतान देने वाली मानी जाती है। षष्ठी को दिनभर के उपवास के बाद व्रती अस्ताचलगामी सूर्य को अघ्र्य अर्पित करते हैं। जो षष्ठी देवी की अराधना होती है। मान्यता है कि इस व्रत को द्रोपदी ने भी की थी, जिसके प्रभाव से युधिष्ठिर को उसका खोया राजपाठ और कीर्ति वापस मिल गई थी। इस पर्व में व्रति का इतना जुड़ाव रहता है कि सूप में भिक्षाटन कर यथासंभव इस व्रत का पालन करते हैं। कुछ लोग विशेष मनौतियों के पूर्ण होने पर भी छठ करने का संकल्प लेते हैं। जबकि कुछ व्रति मन्नत पूर्ण होने के उपरांत दंडवत करते हुए छठ घाट तक जाते है। यह पर्व सूर्योपासना का विशुद्ध रूप से लोकपर्व है। शुक्रवार को चास-बोकारो समेत आसपास के इलाकों के हजारों छठव्रती छठी मइया दरसन देहू अपन, सूरज देव दरसन देहु अपन...गीत के बीच अस्ताचलगामी सूर्य को अघ्र्य देंगे।

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