
JMM की ऐसी आंधी चली कि अपना वोट भी नहीं बचा सकी BJP, सोमेश की जीत की बड़ी वजहें
घाटशिला उपचुनाव में झारखंड मुक्ति मोर्चा ने बंपर जीत दर्ज की है। इस उपचुनाव में जेएमएम की जीत के कई बड़े कारण हैं। जेएमएम की ऐसी लहर थी कि भाजपा अपनी परंपरागत वोट भी नहीं बचा सकी।
शुक्रवार को झामुमो की ऐसी आंधी चली कि पिछले साल की परंपरागत वोट को भी भाजपा नहीं बचा सकी। गांव के वोट तो दूर शहरी क्षेत्र में भी घाटशिला विधान से इतिहास में पहली बार लीड लेने में भाजपा नाकाम रही। घाटशिला विधान सभा में कुल 300 बूथ हैं। इनमें एक से लेकर 125 बूथ घाटशिला प्रखंड में हैं। गालूडीह में शुरू से ही भाजपा और झामुमो में कड़ी टक्कर होने की परंपरा रही है। बूथ संख्या-1 से लेकर 30 तक गालूडीह क्षेत्र में आता है, लेकिन इन बूथों में जब भाजपा पांच से छह हजार वोटों से पिछड़ी तो भाजपा को उम्मीद थी कि शहर में आते ही झामुमो को पीछ छोड़ देंगे।
शहरी बूथ संख्या 31 से लेकर 86 तक झामुमो अपना लीड सात हजार से ऊपर कर लिया। ऐसा पहली बार हुआ जब झामुमो को घाटशिला शहरी क्षेत्र में इतनी बड़ी लीड मिली। सात हजार से शहरी क्षेत्र में पिछड़ते देख भाजपाई मतगणना स्थल से धीरे-धीरे खिसकने लगे और उन्हें एहसास हो गया कि जब शहरी क्षेत्र में लीड नहीं कायम कर सके तो झामुमो के गढ़ दामपाड़ा में कहा से लीड ले सकेंगे। शहरी क्षेत्र में बढ़त बनाने के साथ-साथ सोमेश ग्रामीण क्षेत्र में बढ़त का सिलसिला जारी रखा। क्योंकि, घाटशिला शहरी क्षेत्र से लगभग सात हजार के बढ़त लेकर बूथ संख्या 88 से आगे बढ़ते हुए प्रखंड के अंतिम बूथ 125 तक इनकी कुल बढ़त 15 हजार से ऊपर की हो गयी। घाटशिला प्रखंड में आज तक झामुमो इतनी बढ़त कभी नहीं ले पायी थी। क्योंकि, भाजपा शुरू से ही इस प्रखंड में अपनी स्थिति मजबूत बनाये रखी थी, लेकिन वह भी इस बार टूटती नजर आयी।
सोमेश को जीत में कई फैक्टर ने निभाई अहम भूमिका
घाटशिला के उपचुनाव में कई फैक्टर इस बार झारखंड मुक्ति मोर्चा की जीत को बड़ा बनाने में कारक बने। जीत का अंतर पिछले चुनाव के मुकाबले ज़्यादा रहा। भावनात्मक लहर के अलावा सोमेश की व्यक्तिगत छवि भी अपने प्रतिद्वंदी बाबूलाल सोरेन के आगे कहीं न कहीं लोगों को ज़्यादा अच्छी लगी, जिसने झामुमो के पारंपरिक वोटरों के साथ गैर पारंपरिक वोटरों का ध्यान भी खींचा। चुनाव प्रचार के दौरान भावनाओं की सियासत करने में चंपई सोरेन ने भी कोई कमी नहीं छोड़ी। चंपाई ने आंसू भी बहाए, पर जनता पर असर नहीं पड़ा।
घाटशिला को विकसित करने में रामदास सोरेन की छवि ने भी चुनाव में प्रभाव डाला और जीत की राह बनाई। जीत के लिए हेमंत सोरेन सरकार की सकारात्मक छवि भी काम आई। आदिवासी वोट एकमुश्त भाजपा के खिलाफ गया। भाषाई अल्पसंख्यक समुदाय विशेषकर ओड़िया का ज्यादा और बंगाली समुदाय के एक बड़े हिस्से ने भाजपा के खिलाफ वोटिंग की। कुड़मी समाज के एक हिस्से ने भी झामुमो गठबंधन के पक्ष में वोट किया। कुड़मी बुद्धिजीवियों ने यह कहकर जेएलकेएम को खारिज कर दिया कि जेएलकेएम को यहां वोट देने से वोट बर्बाद होगा। भाजपा के उम्मीदवार और चम्पाई सोरेन के सुपुत्र कुड़मियों की पसंद नहीं बन सके। वे मानकर चले कि घाटशिला उपचुनाव दो ध्रुवीय होने जा रहा है, इसलिए इनमें से एक को चुनना है और जो हार्डकोर झारखंडी चेतना रखने वाले कुड़मी एवं अन्य मूलवासी ने सोमेश सोरेन को वोट किया।





