नहीं मिला कोड-कॉलम, सरना धर्म ही लिखेंगे आदिवासी; क्या बोले माझी
जनगणना को लेकर आदिवासी समुदायों, विशेषकर संताल आदिवासियों ने अपनी धार्मिक पहचान को लेकर निर्णायक रुख अख्तियार कर लिया है। माझी परगना महाल के माझी बाबा भुगलू सोरेन का तर्क है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25-28 के तहत प्रत्येक नागरिक को आस्था चुनने, उसका पालन करने की मौलिक स्वतंत्रता प्राप्त है।

भारत में जनगणना को लेकर आदिवासी समुदायों, विशेषकर संताल आदिवासियों ने अपनी धार्मिक पहचान को लेकर निर्णायक रुख अख्तियार कर लिया है। संताल आदिवासियों की पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था द्वारा आयोजित पंचायतों में यह सर्वसम्मति से फैसला लिया गया कि जनगणना प्रपत्र में अलग कोड या विशेष कॉलम की अनुपस्थिति के बावजूद समाज के सभी लोग धर्म के स्थान पर सरना ही लिखेंगे। यह निर्णय उस स्थिति में लिया गया है, जब सरकार ने स्पष्ट किया कि अगली जनगणना में केवल छह धर्मों-हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, बौद्ध, सिख और जैन को ही अलग विकल्प के रूप में रखा जाएगा। आदिवासियों में इस बात को लेकर आक्रोश है कि वर्षों की मांग के बाद भी उनके लिए कोई आधिकारिक कोड आवंटित नहीं किया गया है।
माझी परगना महाल के माझी बाबा भुगलू सोरेन का तर्क है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 के तहत प्रत्येक नागरिक को अपनी आस्था चुनने और उसका पालन करने की मौलिक स्वतंत्रता प्राप्त है। जनगणना प्रपत्र से ट्राइब कॉलम का हटाया जाना उनके संवैधानिक अधिकारों का हनन और उनकी विशिष्ट पहचान को मिटाने की सुनियोजित साजिश है। सोरेन ऐतिहासिक संदर्भों का जिक्र करते हुए कहते हैं कि वर्ष 1951 की पहली जनगणना में आदिवासियों के लिए ट्राइब को अलग कॉलम के रूप में कोड संख्या 9 का प्रावधान किया गया था। विडंबना यह है कि 1961 के बाद से इस विशेष पहचान को आधिकारिक दस्तावेज से क्रमिक रूप से हटा दिया गया।
50 लाख ने स्वेच्छा से दर्ज करवाया था सरना धर्म
2011 की जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि उस समय लगभग 50 लाख लोगों ने स्वेच्छा से अपना धर्म सरना दर्ज कराया था, जबकि कुल 90 लाख लोगों ने खुद को प्रचलित संगठित धर्मों से अलग अन्य श्रेणी में रखा था। वर्तमान आंदोलन का मुख्य उद्देश्य भविष्य की जनगणना में सरना कोड को स्थायी मान्यता दिलाना है। इसके लिए समाज के लोगों को जागरूक किया जा रहा है। साथ ही गावों में बैठक भी की जा रही है और समाज के लोगों को इसकी अहमियत बताई जा रही है।
गावों में चलाया जा रहा है जागरूकता अभियान
आदिवासी समुदायों का मानना है कि उनकी प्रकृति-पूजक परंपराएं और रीति-रिवाज किसी भी संगठित धर्म से पूरी तरह भिन्न हैं। जनगणना में उनकी पहचान दर्ज नहीं होने से न केवल उनकी जनसांख्यिकीय स्थिति धुंधली होती है, बल्कि उन्हें अपनी सांस्कृतिक विरासत को अक्षुण्ण रखने में भी कठिनाई आती है। पंचायतों के माध्यम से अब गांवों में जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है, ताकि जनगणना कर्मी जब घर पहुंचें तो समाज का हर व्यक्ति बिना किसी भ्रम के सरना धर्म ही अंकित कराए। यह मुहिम केवल एक नाम दर्ज कराने की नहीं, बल्कि अपनी जड़ों और अस्तित्व को बचाने की लंबी लड़ाई का हिस्सा बन चुकी है।
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Mohammad Azamसंक्षिप्त विवरण
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