जिनपिंग ने ट्रंप के लिए बिछाया रेड कार्पेट, क्या बनने जा रहा है 'G2'? भारत के क्वॉड वाले गुट पर कैसा असर
अगर अमेरिका चीन को एशिया के 'मैनेजर' के रूप में स्वीकार कर लेता है, तो भारत का क्षेत्रीय प्रभाव कम हो सकता है। इससे क्वॉड की प्रासंगिकता पर असर पड़ सकता है, जो भारत के लिए अच्छी खबर नहीं है।

पूरी दुनिया की निगाहें इस वक्त अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के चीन दौरे पर टिकी हैं। डोनाल्ड ट्रंप आधिकारिक दौरे पर चीन पहुंचे हैं जहां गुरुवार को चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने रेड कार्पेट बिछाकर उनका स्वागत किया। इस मुलाकात के बाद दुनियाभर में एक नए गुट की चर्चा शुरू हो गई है। यह चर्चा है G2 ब्लॉक की। सवाल है कि क्या अमेरिका और चीन मिलकर अब एक 'अनौपचारिक G2 समूह' बनाने की राह पर हैं? अगर इस सवाल का जवाब हां है तो यह भारत के लिए एक बड़ा रणनीतिक बदलाव होगा। वहीं चीन को काउंटर करने के लिए बनाए गए क्वॉड पर भी इसका असर होगा।
'G2' ब्लॉक में दुनिया की दो सबसे बड़ी महाशक्तियां, अमेरिका और चीन साथ आ सकते हैं। यह दोनों ही देश ऐसे हैं जो वैश्विक व्यापार, सुरक्षा और तकनीक के क्षेत्र में जो भी फैसले लेते हैं उनका असर पूरी दुनिया पर पड़ता है। ट्रंप पहले भी कई बार इस समूह का जिक्र कर चुके हैं और हाल ही में 2025 में भी अपने सोशल मीडिया पर लिखा था कि “G2 जल्द आने वाला है।”
क्या है ‘G2’ का आइडिया?
G2 का विचार पहली बार 2005 में अमेरिकी अर्थशास्त्री फ्रेड बर्गस्टन और रणनीतिकार ब्रजेजिंसकी ने दिया था। उसके मुताबिक इस समूह के तहत अमेरिका और चीन वैश्विक अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों को संभालने के लिए साथ आ सकते हैं। इसके बाद बराक ओबामा के कार्यकाल में भी यह विचार कुछ हद तक आगे बढ़ा। 2009 में चीन और अमरीका के बीच स्ट्रेटेजिक और इकनॉमिक बातचीत शुरू हुई। उस समय चीन के राष्ट्रपति हू जिंताओ थे।
हालांकि समय के साथ दोनों देशों के रिश्ते बिगड़ते गए और सहयोग की जगह प्रतिस्पर्धा बढ़ गई। अमेरिका चीन को पार्टनर नहीं बल्कि एक बड़ा प्रतिद्वंद्वी मानने लगा। हालांकि अब डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात के दौरान शी जिनपिंग ने कहा है कि दोनों देशों को एक दूसरे का पार्टनर बनना चाहिए, प्रतिद्वंद्वी नहीं। वहीं ट्रंप ने भी जिनपिंग को अपना दोस्त बताया है।
चीन का क्या रुख?
कुछ चीनी विशेषज्ञों का मानना है कि “G2” का विचार अमेरिका की सोच से निकला है और चीन इससे पूरी तरह सहमत नहीं है। चीन का कहना है कि दुनिया को सिर्फ दो देश नहीं चला सकते, बल्कि सभी देशों को मिलकर काम करना चाहिए यानी वह “मल्टीपोलर वर्ल्ड” की बात करता है, जहां कई देश मिलकर फैसले लें। वहीं ज्यादातर विशेषज्ञ भी यह मानते हैं कि अभी “G2” बनना मुश्किल है। यहां असल समस्या यह है कि दोनों देश खुद को सबसे ताकतवर बनाना चाहते हैं। अमेरिका अपनी वैश्विक पकड़ बनाए रखना चाहता है, वहीं अब चीन इसे खुली चुनौती दे रहा है।
भारत के लिए क्या मायने?
अगर अमेरिका और चीन के बीच बहुत करीबी समझौता होता है, तो भारत के लिए चुनौतियां बढ़ सकती हैं। अमेरिका चीन को एशिया के 'मैनेजर' के रूप में स्वीकार कर ले, तो भारत का क्षेत्रीय प्रभाव कम हो सकता है। वहीं क्वॉड की प्रासंगिकता पर भी असर पड़ेगा। भारत ने अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर इस समूह को चीन की आक्रामकता के विरोध में मजबूत किया है। अब US-चीन के साथ आने से इसकी नींव कमजोर पड़ सकती है।
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लेखक के बारे में
Jagriti Kumariजागृति को छोटी उम्र से ही खबरों की दुनिया ने इतना रोमांचित किया कि पत्रकारिता को ही करियर बना लिया। 2 साल पहले लाइव हिन्दुस्तान के साथ करियर की शुरुआत हुई। उससे पहले डिग्री-डिप्लोमा सब जर्नलिज्म और मास कम्युनिकेशन में। भारतीय जन संचार संस्थान (IIMC), नई दिल्ली से पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा और संत जेवियर्स कॉलेज रांची से स्नातक के बाद से खबरें लिखने का सिलसिला जारी। खबरों को इस तरह से बताना जैसे कोई बेहद दिलचस्प किस्सा, जागृति की खासियत है। अंतर्राष्ट्रीय संबंध और अर्थव्यवस्था की खबरों में गहरी रुचि। लाइव हिन्दुस्तान में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान शानदार कवरेज के लिए इंस्टा अवॉर्ड जीता और अब बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर रोजाना कुछ नया सीखने की ललक के साथ आगे बढ़ रही हैं। इसके अलावा सिनेमा को समझने की जिज्ञासा है।
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