बॉस ने 'खराब परफॉर्मेंस' बताकर नौकरी से निकाला, अब कंपनी को देने पड़े 22 लाख रुपये
सिंगापुर में 'खराब परफॉर्मेंस' का बहाना बनाकर महिला को नौकरी से निकालना कंपनी को भारी पड़ गया। ट्रिब्यूनल ने बर्खास्तगी को गलत ठहराते हुए कंपनी को 22 लाख रुपये हर्जाना देने का आदेश दिया।

कंपनियां अक्सर 'खराब परफॉर्मेंस' का बहाना बनाकर कर्मचारियों को तंग करने या नौकरी से निकालने जैसा कदम उठाती हैं। अब ऐसे ही एक मामले में कर्मचारी की बड़ी जीत हुई है। मामला सिंगापुर का है। यहां एक महिला को अपनी कंपनी से 22 लाख रुपये (30,000 सिंगापुर डॉलर) का हर्जाना मिला है। इस महिला को कंपनी ने 6 महीने के प्रोबेशन पीरियड के बाद 'खराब परफॉर्मेंस' का हवाला देकर नौकरी से निकाल दिया था। लेकिन महिला ने इस फैसले के खिलाफ एम्प्लॉयमेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल (ECT) का दरवाजा खटखटाया। ट्रिब्यूनल ने माना कि कंपनी ने महिला को अचानक और गलत तरीके से नौकरी से निकाला था।
क्या है पूरा मामला?
महिला अप्रैल 2025 में एक ऑडिट मैनेजर के तौर पर 6 महीने के प्रोबेशन पर कंपनी से जुड़ी थी। प्रोबेशन खत्म होने पर कंपनी ने यह कहते हुए उसकी नौकरी पक्की करने से इनकार कर दिया कि उसका काम संतोषजनक नहीं है। मई और जून 2026 में हुई सुनवाई के दौरान महिला और कंपनी दोनों ने ट्रिब्यूनल में अपना-अपना पक्ष रखा। इस मामले में एम्प्लॉई और कंपनी दोनों की पहचान गुप्त रखी गई है।
महिला ने कंपनी पर क्या आरोप लगाए?
महिला का तर्क था कि उसे काम को लेकर कभी कोई औपचारिक या अनौपचारिक चेतावनी नहीं दी गई। उसे परफॉर्मेंस के ऐसे पैमानों पर परखा गया, जिन्हें कभी उसके साथ शेयर ही नहीं किया गया था।
महिला ने यह भी दावा किया कि कोरियन भाषा न बोलने के कारण उसके साथ भेदभाव हुआ, जबकि ऑफिस की आधिकारिक भाषा अंग्रेजी थी। इसके अलावा, कंपनी के इंटरनल ऑडिट रिपोर्टिंग स्ट्रक्चर पर सवाल उठाने के कारण भी उसके साथ गलत व्यवहार किया गया। हालांकि पर्याप्त सबूत न होने के कारण ट्रिब्यूनल ने भाषा के आधार पर भेदभाव और बदले की भावना वाले इन आरोपों को खारिज कर दिया था।
कंपनी ने अपनी सफाई में क्या कहा?
कंपनी ने ट्रिब्यूनल को बताया कि महिला को सिर्फ उसके प्रदर्शन के आधार पर निकाला गया है। कंपनी के नियमों के मुताबिक, प्रोबेशन वाले कर्मचारियों को 10 कोर योग्यताओं में कम से कम 80% का ओवरऑल स्कोर और 5 में से 3 की औसत रेटिंग लानी होती है। कंपनी के असेसमेंट के अनुसार, महिला का ओवरऑल स्कोर 71% और औसत रेटिंग 2.4 थी।
ट्रिब्यूनल ने पकड़ी कंपनी की गलती
ट्रिब्यूनल के मजिस्ट्रेट जोएल टैन ने पाया कि कंपनी यह साबित करने में नाकाम रही कि ये रेटिंग महिला के असल काम को सही से दर्शाती हैं। फैसले में यह भी दर्ज किया गया कि महिला के सुपरवाइजर ने खुद माना कि जब महिला ने नौकरी शुरू की थी, तब उसे इस रेटिंग सिस्टम के बारे में नहीं बताया गया था।
इसके अलावा कंपनी की खुद की प्रोबेशन पॉलिसी के तहत जो 'फॉर्मल परफॉर्मेंस रिव्यू' होने चाहिए थे, वो भी नहीं किए गए। मजिस्ट्रेट ने कहा कि सुपरवाइजर ने महिला के ऑडिट के काम में कोई कमी नहीं निकाली थी, बल्कि ज्यादातर शिकायतें सिर्फ प्रशासनिक और प्रक्रिया से जुड़ी बातों को लेकर थीं।
कैसे मिला 22 लाख रुपये का अधिकतम मुआवजा?
ट्रिब्यूनल ने साफ किया कि महिला को गलत तरीके से निकाला गया है और उसे ईसीटी के तहत मिलने वाला अधिकतम मुआवजा दिया गया। महिला की महीने की सैलरी 11,500 सिंगापुर डॉलर थी। इस हिसाब से उसे हुए 3 महीने के नुकसान के लिए 34,500 सिंगापुर डॉलर मिलने चाहिए थे। लेकिन, ट्रिब्यूनल अधिकतम 30,000 सिंगापुर डॉलर (करीब 22 लाख रुपये) का ही मुआवजा दिला सकता है, इसलिए महिला को यही रकम दी गई।
मजिस्ट्रेट जोएल टैन ने कहा कि अगर कानून में मुआवजे की अधिकतम सीमा नहीं होती, तो वे महिला को मानसिक परेशानी के लिए 2 महीने की और सैलरी देते, जिससे कुल मुआवजा 57,500 सिंगापुर डॉलर हो जाता। मजिस्ट्रेट ने अपने फैसले में जोर देकर कहा कि कंपनियां अपने कर्मचारियों से उन मानकों को पूरा करने की उम्मीद नहीं कर सकतीं, जिनके बारे में उन्हें कभी साफ तौर पर बताया ही न गया हो या जिनका सही से आकलन न किया गया हो।


